हर वर्ष तिल के सामान बढ़ता है काशी का यह शिवलिंग, अद्भुत है तिलभांडेश्वर महादेव की कथा

काशी के कंकड़-कंकड़ में भगवान शंकर का वास है. भगवान शिव के प्रसिद्ध तीर्थों में उत्तर प्रदेश के काशी (वाराणसी) का महत्वपूर्ण स्थान है. यहां काशी विश्वनाथ के अलावा भी कई ऐसे शिव मंदिर हैं जिनको देखने से प्रतीत होता है कि इसमें स्वयं भगवान शंकर विराजमान हैं. ऐसा ही एक प्राचीन मंदिर है तिलभांडेश्वर महादेव. यह वाराणसी के भीड़ भाड़ वाले इलाके मदनपुरा के बी17/42 तिलभांडेश्वर रोडपर स्थित है.

स्वयं प्रकट हुआ है यह शिवलिंग

इस मंदिर के संबंध में मान्यता है कि हर साल मकर संक्रांति पर यहां स्थित शिवलिंग तिल-तिल करके बढ़ता है. इस कारण इस मंदिर को तिलभांडेश्वर कहा जाता है. मंदिर से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं. एक मान्यता के अनुसार पुराने समय में इस क्षेत्र में तिल की खेती होती थी. उस समय किसानों को इस क्षेत्र में ये शिवलिंग दिखाई दिया था. लोगों ने शिवलिंग की पूजा करनी शुरू कर दी. यहां के लोग शिवलिंग पर तिल चढ़ाते थे. इस वजह से इसे तिलभांडेश्वर कहा जाने लगा.

यहीं पर ऋषि विभांड की थी तपस्थली

तिलभांडेश्वर महादेव शिवलिंग के संबंध में एक अन्य मान्यता प्रचलित है कि ये स्वयंभू शिवलिंग है. ये क्षेत्र ऋषि विभांड की तप स्थली था. ऋषि विभांड यहीं पर शिव पूजा करते थे. भगवान ने उनके तप से प्रसन्न होकर वरदान दिया था कि ये शिवलिंग हर साल तिल के बराबर बढ़ता रहेगा. इस शिवलिंग के दर्शन से अश्वमेघ यज्ञ से मिलने वाले पुण्य के बराबर पुण्य फल मिलता है. तिल के बराबर बढ़ते रहने से और ऋषि विभांड के नाम पर इस मंदिर को तिलभांडेश्वर नाम मिला है.

मुस्लिम शासकों ने किया था शिवलिंग को क्षति पहुँचाने का प्रयास

यहां कथा प्रचलित है कि मुगल बादशाह औरंगजेब काशी आया था. उस समय बादशाह ने इस मंदिर को तोड़ने के लिए यहां सैनिक भेजे थे. जैसे ही सैनिकों ने शिवलिंग को तोड़ने की कोशिश की तो शिवलिंग से रक्त बहने लगा. ये चमत्कार देखकर सभी सैनिक यहां से भाग गए. एक अन्य कथा के अनुसार मुस्लिम शासन के दौरान अन्य मंदिरों ध्वस्त करने के क्रम में तिलभाण्डेश्वर को भी नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गयी. मंदिर को तीन बार मुस्लिम शासकों ध्वस्त कराने के लिए सैनिकों को भेजा लेकिन हर बार कुछ न कुछ ऐसा घट गया कि सैनिकों को मुंह की खानी पड़ी. अंग्रजी शासन के दौरान एक बार ब्रिटिश अधिकारियों ने शिवलिंग के आकार में बढ़ोत्तरी को परखने के लिए उसके चारो ओर धागा बांध दिया जो अगले दिन टूटा मिला. कई जगह उल्लेख मिलता है कि माता शारदा इस इस स्थान पर कुछ समय के लिए रूकी थीं.

विजयानगरम के किसी राजा ने कराया था इस भव्य मंदिर का निर्माण

इस मंदिर के निर्माण के बारे में यह कहा जाता है कि विजयानगरम के किसी राजा ने इस भव्य एवं बड़े मंदिर को बनवाया था. तीन मंजिल वाले इस मंदिर में मुख्य द्वार से भीतर जाकर दाहिनी ओर नीचे गलियारे से जाने पर विभाण्डेश्वर शिवलिंग स्थित हैं. इस शिवलिंग के ऊपर तांबे की धातु चढ़ायी गयी है. मान्यता के अनुसार विभाण्डेश्वर के दर्शन के उपरांत तिलभाण्डेश्वर का दर्शन करने पर सारी मनोकामना पूर्ण हो जाती है. बनारसी एवं मलयाली संस्कृति के उत्कृष्ट स्वरूप वाले इस मंदिर में भगवान अइप्पा का भी मंदिर स्थित है जिसकी दीवारों पर मलयाली भाषा में जानकारियां लिखी हुई हैं. इस मंदिर के आगे उपर सीढ़ियां चढ़ने पर बायीं ओर स्थित है स्वयंभू शिवलिंग तिलभाण्डेश्वर. सुरक्षा की दृष्टि से गर्भगृह को लोहे की जाली से बंद कर दिया गया है.

वर्ष भर में होते हैं 4 बड़े आयोजन

काशी के प्रमुख शिवालयों में से एक तिलभाण्डेश्वर महादेव मंदिर में वर्ष भर में चार बड़े आयोजन होते हैं. महाशिवरात्रि के दिन शिव के पंचमुखेश्वर रूप को जो कि तांबे का बना हुआ है तिलभाण्डेश्वर शिवलिंग के उपर रखा जाता है पूरा दिन रहता है. जिसके दर्शन के लिए काफी संख्या में भक्त उमड़ते हैं. वहीं मकर संक्रांति वाले दिन बाबा का चंदन श्रृंगार किया जाता है. सावन महीने में मंदिर में रूद्राभिषेक होता है जबकि दीपावली पर अन्नकूट का आयोजन किया जाता है. इस दौरान भजन-कीर्तन का सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होता है. मंदिर खुलने का समय सुबह 5 बजे से रात्रि साढ़े 9 बजे तक है. वहीं दिन में 1 से 4 बजे के बीच गर्भगृह बंद रहता है. प्रतिदिन आरती सुबह 6 बजे होती है. तिलभाण्डेश्वर मठ भी है. जिसमें साधु संत रहते हैं. जबकि मंदिर की गतिविधियों को देखने की जिम्मेदारी केरल के साधु संत निभा रहे हैं.