बनारस के राजनीति की दशा और दिशा तय करने वाले औरंगाबाद हाउस से कांग्रेस का मोहभंग, पं० कमलापति त्रिपाठी से रहा है गहरा नाता

वाराणसी के औरंगाबाद हाउस का नाम आते ही जो चेहरा ज़ेहन में सबसे पहले सामने आता है वह है पं. कमलापति त्रिपाठी का. काशी के औरंगाबाद मोहल्ले में स्थित होने के कारण इसका यह नाम पड़ा. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पं० कमलापति त्रिपाठी लेखक, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी, ग्रंथकार होने के साथ-साथ हिंदी व संस्कृत के जानकार भी थे. आजादी की लड़ाई हो, पूर्वांचल में रेलवे का विकास हो या चंदौली और मीरजापुर में नहरों के जाल का फैलाव, सबमें इस युग पुरुष की छवि दिखती है.

सर्व विद्याओं व विधाओं में भारत की गौरवशाली परंपरा का प्रतिनिधित्व करने वाली सनातन काशी नगरी में भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में श्रेष्ठता के आधार पर श्रेयमंडित ऐसे बहुत से ठौर मिल जाएंगे जिनकी अलग पहचान है. ये महल, दुर्ग, भवन, कोठी, कुंज व विला जैसी उपाधियों से अलंकृत हैं. अलबत्ता त्रिपाठी कुल का आवास ही एकमेव ऐसा सदन है जिसे काशीवासियों की ओर से ‘हाउस जैसा संबोधन प्राप्त है. पुरनिये बताते हैं कि बाबू जी के माथे पर लगा गोल तिलक सुबह-ए-बनारस के उगते सूर्य की तरह आभा बिखेरता था.

लोग गर्व महसूस करते थे, यह बताने में कि बाबू जी उन्हें नाम से जानते हैं. उनका राजनीतिक कद जितना विराट था, व्यक्तित्व गंगा की लहरों जैसा सहज. जब भी वह आते तो काशी के घाट पर जाना और पान खाना नहीं भूलते. औरंगाबाद हाउस में उस दौरान बनारस के साथ-साथ आसपास के जिलों और बिहार तक के लोग आते थे. वहां का माहौल ऐसा कि कोई नहीं बता सकता कौन बाहरी है और कौन घर का. यह उनके व्यक्तित्व का जादू था. लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया सूबे की राजनीति में औरंगाबाद हाउस का असर कम होता गया.

1905 में शुरू हुई कांग्रेस में सक्रिय राजनीति

राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर सतीश राय ने बताया कि करीब 400 वर्ष पूर्व मुगल काल में देवरिया जिले के पिंडी गांव से त्रिपाठी परिवार काशी आकर औरंगाबाद मोहल्ले में रहने लगा. उसी दौरान मुगल सम्राट शाहजहां का पुत्र दाराशिकोह संस्कृत पढऩे काशी आया. काशी के पंडितों ने गैरहिंदू होने के नाते उसे शिक्षा नहीं दी. तब पं० कमलापति के पूर्वज रहे रामानंदपति त्रिपाठी ने उसे शिक्षा दी. 1905 में कांग्रेस का बनारस अधिवेशन गोपाल कृष्ण गोखले की अध्यक्षता में हुआ. पं. नारायनपति त्रिपाठी अधिवेशन की स्वागत समिति में शामिल हो राजनीति में आए. यहीं मालवीय जी से उनका संपर्क बढ़ा. 1920 में उनके पुत्र पं. कमलापति त्रिपाठी भी पार्टी में शामिल हो गए.

पुत्र और बहू भी जीत चुके हैं चुनाव

पंडित कमलापति के पुत्र लोकपति त्रिपाठी पांच बार विधायक और बहू चंद्रा त्रिपाठी चंदौली से सांसद रहीं.  नाती राजेशपति कई चुनाव लड़े, लेकिन एक बार मीरजापुर से एमएलसी चुने गए. पुत्र लोकपति के अलावा मायापति व मंगलापति राजनीति में सक्रिय नहीं रहे. मायापति जरूर 1984 में कांग्रेस से विद्रोह कर लखनऊ से शीला कौल के खिलाफ चुनाव लड़े. ऐसे समृद्ध राजनीतिक इतिहास के बावजूद इस चुनाव में औरंगाबाद हाउस को 116 वर्ष बाद कांग्रेस से परहेज हो गया है. 2021 में कांग्रेस से दूरियां ऐसी बढ़ीं की पंडित कमलापति त्रिपाठी की तीसरी पीढ़ी के राजेशपति और चौथी पीढ़ी के ललितेशपति ने कांग्रेस से नाता तोड़कर तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया.

दिखा ललितेश का जुझारू रूप

1991 के बाद नेपथ्य में चले गए औरंगाबाद हाउस से ललितेशपति राजनीति में उतरे. मीरजापुर के आदिवासी क्षेत्र की मडि़हान सीट से 2012 में विधायक चुने गए. उन्होंने परिवार की खोई हुई सीट (पूर्व की राजगढ़) एक बार फिर हासिल की लेकिन 2017 में उसे बरकरार नहीं रख सके और सपा से गठबंधन के बावजूद हार गए.

सपा का मिला समर्थन

ललितेशपति फिर मडि़हान से चुनाव लड़ सकते हैं. समाजवादी पार्टी ने सीट छोडऩे का प्रस्ताव दिया है. ललितेशपति ने भी सहमति जताई लेकिन यह भी कहा कि ममता बनर्जी के निर्देश पर ही कोई काम होगा.

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