आज के ही दिन बनारस को मिला था नाम “वाराणसी”

श्वेताभ सिंह नागवंशी के कलम से 🖋️

वाराणासी देश का एक ऐसा शहर है जिसे शायद ही कोई नहीं जानता हो. इसका मुख्य वजह यही है कि यह प्राचीनतम शहरों में शुमार होने के साथ-साथ हिंदू धर्म के लिए सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र भी है. 24 मई को इस शहर का नाम वाराणसी स्‍वीकार किया गया. काशीवासियों को यह जानकर प्रसन्‍नता होगी कि मत्स्य पुराण में भी वाराणसी का जिक्र किया गया है.

सबका अपना मत है लेकिन पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार “वरुणा ‘ और “असि’ नाम की नदियों के बीच में बसने के कारण ही इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा हैं. ये नदियाँ गंगा नदी में उत्तर एवं दक्षिण से आकर मिलती हैं.

वाराणसी को कई नामों से बुलाया और जाना जाता है. काेई धर्म नगरी कहता है तो कोई,मोक्ष नगरी तो कोई बनारस या काशी. इसके अलावा अविमुक्त क्षेत्र, आनंदवन, रुद्रवास,आनंद-कानन, महाश्मशान, सुरंधन, ब्रह्मावर्त, सुदर्शन, रम्य के नाम भी जाना जाता रहा है.

प्रशासनिक तौर पर 24 मई 1956 को इसका वाराणसी नाम स्वीकार किया गया था. बौद्ध साहित्य में भी इसके अनेक नाम मिलते हैं. उदय जातक में सुर्रूंधन (अर्थात सुरक्षित), सुतसोम जातक में सुदर्शन (अर्थात दर्शनीय), सोमदंड जातक में ब्रह्मवर्द्धन, खंडहाल जातक में पुष्पवती, युवंजय जातक में रम्म नगर (यानि सुन्दर नगर), शंख जातक में मोलिनो (मुकुलिनी) नाम आते हैं. इसे काशीनगर और काशीपुर के नाम से भी जाना जाता था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, काशी नगर की स्थापना हिन्दू भगवान शिव ने लगभग 5000 वर्ष पूर्व की थी जिस कारण ये आज एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है.

ऐसा कहा जाता हैं कि काशी नरेश (काशी के महाराजा) वाराणसी शहर के मुख्य सांस्कृतिक संरक्षक एवं सभी धार्मिक क्रिया-कलापों के अभिन्न अंग हैं. वाराणसी की संस्कृति का गंगा नदी एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट रिश्ता है. ये शहर सहस्रों वर्षों से भारत का, विशेषकर उत्तर भारत का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना वाराणसी में ही जन्मा एवं विकसित हुआ है. भारत के कई दार्शनिक, कवि, लेखक, संगीतज्ञ वाराणसी में रहे हैं. जिनमें कबीर, वल्लभाचार्य, रविदास, स्वामी रामानंद, त्रैलंग स्वामी, शिवानन्द गोस्वामी, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया एवं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि कुछ हैं. गोस्वामी तुलसीदास ने हिन्दू धर्म का परम-पूज्य ग्रंथ रामचरितमानस यहीं लिखा था और गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन यहीं निकट ही सारनाथ में दिया था.

बनारस इसलिए भी मशहूर हैं क्योंकि यहाँ चार बड़े विश्वविद्यालय स्थित हैं –

जैसे,बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइयर टिबेटियन स्टडीज़,संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय.

यहां के निवासी भोजपुरी बोलते हैं, जो हिन्दी की ही एक बोली है. वाराणसी को ‘मंदिरों का शहर’, ‘भारत की धार्मिक राजधानी’, ‘भगवान शिव की नगरी’, ‘दीपों का शहर’, ‘ज्ञान नगरी’ आदि नमो से संबोधित किया जाता है.

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