Varanasi: “धर्म बदलो या पाकिस्तान छोड़ो” भारत -पाक विभाजन की विभीषिका झेल चुके तिलकर राज कपूर ने बताई अपने दर्द की दास्ताँ

आज 14 अगस्त को प्रत्येक देशवासी अमृत महोत्सव मना रहा है. वहीँ, दूसरी ओर लोगों के मन में 75 वर्ष पूर्व हुई घटना को लेकर भी दर्द आज भी दिखा रहा है. 14 अगस्त 1947 का वह रक्तरंजित इतिहास देशवासी कभी नहीं भूलेंगे. माना जाता है कि भारत के कैलेंडर में 14 अगस्त की तारीख हिन्दुओं और सिखों के खून से लिखी गई है. ऐसे में वाराणसी के रहने वाले 94 वर्षीय तिलक राज कपूर, जो कि विभाजन का दर्द झेल चुके हैं. अपनी कहानी बता रहे हैं.

तिलक राज कपूर 1942 में सरकारी भवनों पर (तत्कालीन ब्रिटिश भवन) ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ का नारा लिखते हुए पकडे गए थे. अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें थाने में बंद करके 11 कोड़ों की सजा दी. विभाजन के बाद उन्हें अपने धर्म और जीवन के संरक्षण के लिए अपना व्यापार, घर वगैरह सब कुछ छोड़कर भारत में आना पड़ा. वर्तमान में कपूर का पूरा परिवार वाराणसी में रह रहा है.

तिलक राज कपूर 1947 में हुए बंटवारे के मंजर को याद करते हुए बताते हैं कि विभाजन से एक साल पहले ही अराजकता की भूमिका तैयार होने लगी थी. पाकिस्तान में रह रहे हिंदू और सिख अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जाने लगा था.

वह कहते हैं, ”हम पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के मंडी बहाउद्दीन कस्बे में रहते थे. मुझे याद है कि 13 अगस्त, 1947 की भोर में कट्टरपंथी मुनादी कर रहे थे कि अगर पाकिस्तान में रहना है, तो धर्म बदल लो या फिर देश छोड़ दो. इसके अलावा अल्पसंख्यकों के घरों पर हमले भी हो रहे थे.”

‘मंदिरों और गुरुद्वारों में ही बच सकती थी जान

तिलक राज कपूर कहते हैं, ”हम लोग परिवार के साथ घर छोड़ कर मंदिरों और गुरुद्वारों में शरण लिए थे. कट्टरपंथियों का एक जत्था हमारे जानवर खोल ले जाता, दूसरा घर से कीमती सामान लूट ले जाता था. एक जत्था घरों में आग लगता था और अल्पसंख्यकों को खोज-खोज कर गोली मारकर मौत के घाट उतार देता था. ये सब पहले से तय था. कट्टरपंथियों को पहले ही बता दिया गया था कि अल्पसंख्यकों को पाकिस्तान में नहीं रहने देना है.”

विभाजन के दौरान लोगों का एक देश से दूसरे देश ऐसे ही आवागमन होता था

धर्म और इज्जत के बदले महिलाओं ने मौत को गले लगाना उचित समझा

आपबीती बताते हुए कहते हैं, ”कट्टरपंथी ढोल बजाते हुए हमला करने आते थे. हम लोगों में से कुछ के पास बंदूकें थीं. मगर, उनसे थोड़ा-बहुत मुकाबला कर पाने में नाकाफी थीं. कट्टरपंथियों ने जब हमारी महिलाओं को निशाना बनाना शुरू किया, तो धर्म और इज्जत बचाने के लिए उनमें से ज्यादातर ने मौत को गले लगाना उचित समझा. हमारे साथ की कई महिलाओं ने गुरुद्वारों की छतों से कूद कर जान दे दी.” तिलकराज को आज भले ही कम दिखता हो, लेकिन 1947 का नजारा उनको साफ-साफ नजर आता है.

घर छूटने के बाद काशी में लम्बा संघर्ष

उन्होंने बताया, ”14अगस्त, 1947 को करोड़ों की संपत्ति, पूर्वजों का घर, अपनी मिट्टी, कपास समेत अन्य व्यवसाय सब कुछ छोड़ना पड़ा. इसके बाद हम तीन जोड़ी कपड़े लेकर पिता, दो बहनों, दो भाइयों के साथ शरणार्थी कैंप में आ गए. करीब डेढ़ महीने कैंप में रहने के बाद हम ट्रेन से अटारी बॉर्डर पहुंचे. वहां से भारत आ गए.

विभाजन के बीच शरणार्थियों के लिए ऐसे ही कैंप तैयार किये जाते थे.

वह बताते हैं, ”अक्टूबर, 1947 में हमारा परिवार काशी पहुंचा. वाराणसी आने के बाद कई जगह किराए के मकानों में रहते हुए हमने 1950 में बनारसी लंगड़े आम का बगीचा लगाकर कारोबार शुरू किया. आज बेटों के साथ मिलकर हमारा परिवार फलों का बड़ा कारोबार करता है. वाराणसी के परेड कोठी क्षेत्र में 1960 में हमने मकान बनवाया. 1967 में मैं सिविल डिफेंस से जुड़ा और 1980 में मुझे राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया.

पहली बार किसी सरकार ने हमारे दर्द को बांटा है

तिलक राज कपूर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा कि आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि विभाजन की विभीषिका का दंश झेले लोगों के दर्द को सरकार ने बांटने का प्रयास किया है. विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने से देश की नई पीढ़ी को हमारे संघर्षों के बारे में पता चलेगा.