प्रतिभाओं का पलायन हमारे लिए गर्व का नहीं, शर्म का विषय है

सोशल मीडिया पर ट्विटर सीईओ पराग अग्रवाल और गूगल (अल्फाबेट) सीईओ सुंदर पिचाई जैसे भारतीयों को दी जा रही बधाईयों के पीछे प्रतिभा पयालन की बहस हर बार छूट ही जाती है और इस बार भी संभवतः यही हो रहा है.

आज तमाम असहमतियों के बाद भी यह बात कहने में कोई संकोच नहीं है कि भारत की शिक्षा प्रणाली एक ओर जहां बेरोजगारों की फौज खड़ी कर रही है. वहीं यह काफी मजबूत भी है. जो विपरित परिस्थितियों में भी बड़े पैमाने पर बेहद प्रभावशाली और बुद्धिमान मेधावी पैदा करती है, जिनकी मांग दुनिया भर में है.

अमरिका में इस वक्त टेक्नोलाजी का एक बड़ा हिस्सा भारतीय है और वहां की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करता है.

आज भारत से पलायन किए गए ए ग्रेड के डॉक्टरों, पायलटों, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की संख्या की बात करें तो अनुमानित तौर पर दुनिया भर में करीब तीन करोड़ हैं.

यह वो संख्या है, जो भारत में दी गई कुल सरकारी नौकरियों के बराबर है. आकड़े कहते हैं कि भारत में सरकारी नौकरियों में करीब 2.5 से 3 करोड़ लोग हैं.

अगर इन तीन करोड़ लोगों में आधे भी लोग भारत में अपना योगदान देते या सीधे शब्दों में कहें तो इनका योगदान लिया जाता तो भारत की स्थिति और भी बेहतर होती.

हम बात नोबेल पुरस्कारों की करें तो ऐसे दस बीस भारतीय मिल जाएंगे, जिन्होंने यह पुरस्कार प्राप्त किया हैं. मगर इनमें से रवीन्द्रनाथ टैगोर व सर चन्द्रशेखर वेंकटरमण ही ऐसे भारतीय रहे जिनकी कर्मस्थली भारत रही है. बाकी हरगोबिन्द खुराना, अम्रत्य सेन और सुब्रह्मण्य चन्द्रशेखर आदि कई नाम रहे, जो देश में यह उपलब्धि हासिल कर ही नहीं सकते थे.

यही विचारणीय बिंदु है क्योंकि इसका नुकसान ले देकर भारत का ही है. आज अपने कुशल और प्रतिभा-संपन्न व्यक्तियों की हानि से भारत जैसे विकासशील देश सब से अधिक प्रभावित हुए हैं और हद दर्जे के भ्रष्ट व कामचोर लोग देश के नीति निर्धारक बने हुए हैं. जो इतने योग्य हैं कि देश में एक भी विश्वविद्यालय को दुनिया के टॉप 100 की सूची में आने नहीं देते.

हालांकि कुछ अभ्यर्थियों को विदेशी पैकेज व जनजीवन आकर्षित करता है. उनमें देश से जुड़े रहने की भावना भी कम ही होती है. लेकिन सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्यों होता है?

छात्र तो कोरा कागज है. उसमें जो भरा जाएगा वही बनेगा. फिर इस भावना को भरने में देश क्यों पीछे रह जाता है?

वास्तविकता तो यह है कि वैज्ञानिक हो या चिकित्सक या ज्ञान के किसी अन्य क्षेत्र का विशेषज्ञ.. वे कम वेतन और अन्य कठिनाइयों को भी सह सकते हैं, बशर्ते अगर उनकी योग्यता को अच्छी मान्यता मिले. उनके काम का ठीक से मूल्यांकन हो.

आज कोई मेधावी अधिक धन कमाने के लिए विदेश में चला जाता है क्योंकि उसका अपना देश उसके मन की इच्छाओं की पूर्ति के मार्ग में बहुत से कानूनी और राजनीतिक प्रतिबंध लगाता है..

हमारी सरकारें भी भीड़तंत्र के आगे हथियार डालती रहती हैं और रोजगार के कम अवसर, वैकेंसी गैजेट्स को सालों महीनों लटकाए रहना, भ्रष्टाचार, अदालती पेंच उन्हें हतोत्साहित करता है. कभी कभी कोई वैकेंसी आई तो पेपर आउट जैसे मुद्दे और उनसे सबक न लेने आदि जैसे बातें कोढ़ में खाज बनकर उभरता है.

इस तरह का लिजलिजा कॉन्सेप्ट केवल सार्वजनिक क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि प्राइवेट सेक्टर भी इससे पीड़ित है. कई मालिकों को तो केवल जीहूजूरी ही पसंद है और कोई कर्मचारी कितनी ही मेहनत क्यों न करे, लेकिन पदोन्नति उस कर्मचारी का होता है, जिसे बॉस पसंद करता है. वास्तव में कोई कर्मचारी कंपनी को नहीं छोड़ता. बल्कि वह अपने बॉस या अपने साथ काम करने वाले लोगों को छोड़ता है.  

इसका परिणाम यह हुआ कि विकासशील देशों के अधिकांश प्रतिभासंपन्न व्यक्ति रहन-सहन के इस स्तर को प्राप्त करने में प्रसन्नता का अनुभव करते हैं, जो कि विकसित देशों के एक साधारण नागरिक को भी उपलब्ध होती है. हम ऐसी सुविधा अपने मेधावियों को अपने ही देश में उपलब्ध क्यों कराते? यह सत्य है कि पराग अग्रवाल और सुंदर पिचाई जैसे लोग विदेश जाकर भारत के नाम रोशन करते हैं, लेकिन मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि इनका पलायन हमारे लिए गर्व का नहीं बल्कि शर्म का विषय है.

दीपक कुमार पाण्डेय 

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