उपन्यास समीक्षा : The नियोजित शिक्षक

लेखक समाज की सच्चाई को बाहर लाते हैं। विगत दिनों मैंने ऐसा उपन्यास पढ़ा, जिसके बारे में लिखने का मन किया। यह जो मैं लिख रहा हूँ, इसे समीक्षा न माना जाए, क्योंकि समीक्षा में गुण-दोष दोनों होते हैं।

मैं बात करना चाह रहा हूँ, उस उपन्यास के बारे में, जिसे पढ़ने के बाद मेरे अंदर कई बदलाव आए, जैसे- पहले मैं हमेशा एकपक्षीय सोचता था, अब हरपक्ष के बारे में सोचता हूँ। दूसरा मुझे लगता था कि असफल व्यक्ति कभी मेहनत ही नहीं करते होंगे, लेकिन उपन्यास पढ़ने के बाद मैं समझ पाया, असफल व्यक्ति से ज्यादा ‘सफल’ कोई नहीं होते ! आदि-आदि।

वैसे, सच कहूँ, तो मुझे लेखक से जलन हो रहा है। मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं भी ऐसी ही कोई उपन्यास लिखता। विगत सालों में मैंने एक उपन्यास लिखा, लेकिन उन्हें प्रकाशित नहीं करा पाया, जब मैं अपनी अप्रकाशित उपन्यास का लेखक के उपन्यास के साथ तुलना करता हूँ, तो ऐसा लगता है कि मैंने कुछ लिखा ही नहीं है। 

मैं यह जानता हूँ कि हर लेखक का अपना अलग-अलग लेखन ‘स्टाइल’ होता है, परंतु सच जो है, वह मैं खुले दिल से लिख रहा हूँ।

लेखक तत्सम्यक मनु का दूसरा उपन्यास है- ‘द नियोजित शिक्षक’; इन्हीं के बारे में मैंने ऊपर लिखा। मैंने अपने 23 वर्ष के जीवन में कुछ साहित्यकारों को ही पढ़ा है, पर ‘द नियोजित शिक्षक’ पढ़ने के बाद मुझे अभी तक ऐसा फील हो रहा है कि इस उपन्यास में हर वह चीज है, जो किसी ‘कालजयी’ या फिर अच्छे साहित्यकारों की रचनाओं में होती हैं।

उपन्यास में-

“ग्रामीण भाषा है,
तो शहरीकरण भी है,
निजी कोचिंग की माया हैं,
तो सरकारी स्कूल भी हैं,
दिन की खुशी है,
तो रात की उदासी भी हैं।”

सच में, किताब ज़िन्दगी के रहस्यों को समेटती है, जो इसे ‘कालजयी’ बनाती हैं !

नाम – विजय कुमार

परिचय – PG का छात्र हूँ, कई रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित.
संपर्क- उज्जैन, मध्यप्रदेश।

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