भीख में मिला ज्ञान और दान दोनों समाज को समर्पित करता हूं: डॉक्टर सत्य प्रकाश, वैज्ञानिक, काशी हिंदू विश्वविद्यालय

 मानव राष्ट्र की एक इकाई है और उसके द्वारा संचित ज्ञान राष्ट्र की एक पूंजी. एक अच्छा मनुष्य निर्माण करने के लिए, राष्ट्र का अत्यधिक संसाधन और ऊर्जा खर्च की जाती रही है…और मानव संसाधन के रूप में किया गया विकास अगले 100 वर्षों के लिए राष्ट्र का संसाधन बनता ही है.

 सभ्य समाज के निर्माण में, अच्छी शिक्षा और संस्कार के माध्यम से मनुष्य, अपनी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जीवन पद्धतियों का ज्ञान कराता है तथा व्यष्टि से समष्टि तक की यात्रा के महत्व को समझते और समझाते हुए इस मानव जन्म को क्यों पाया!?? इस पर आत्मबोध करने की प्रेरणा भी स्वयं प्राप्त करता है, और अन्य को देता है.

 मेरा ऐसा मानना है कि प्रत्येक मनुष्य का जन्म और निर्माण, किसी अच्छे कार्य के लिए ही, जन्म देने वाले भगवान और धरा पर उपस्थित भगवान के रूप माता पिता और गुरु के द्वारा किया जाता है!

 जन्म देने वाले भगवान  और माता-पिता की अभिलाषा जुड़कर प्रत्येक मनुष्य के लिए, उसके प्रारब्ध  का काम करती है, तथा गुरु के निर्देशन में प्रत्येक मनुष्य अपने द्वारा उपार्जित ज्ञान से अपने जीवन का निर्वाह तथा अपने जन्म के मूल उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सतत कार्य को समझने और करने में करता है. मेरा यह भी मानना है कि प्रत्येक मनुष्य का जीवन एक यात्रा है.. जिसमें प्रतिक्षण एक नया अन्वेषण और अच्छा कार्य होने की संभावना बनी रहती है. वेद और सामान्य लोगों के द्वारा कहा तो यहां तक जाता है, कि यदि मनुष्य पूरे जीवन काल में भी कोई भी अच्छा कार्य न किया हो, तब भी अंतिम क्षणों में यदि वह सन्मार्ग को प्राप्त कर ले और भूल से ही नारायण का नाम लेकर आह्वान करें, तब भी उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है. शांति स्थापना का दूसरा नाम मोक्ष भी हो सकता है.

 जब हमारे जीवन के संबंध में और जीवन मोक्ष के संबंध में इतना सुंदर मार्ग बताया गया है, तब, हमें कभी भी अपनी नई शुरुआत करने के लिए अंतिम क्षणों का इंतजार नहीं करना चाहिए… बल्कि हमें जब अवसर मिले तब किसी अच्छी पद्धति और विचार को अपनाना चाहिए और उसमें अपना जुड़ाव बना कर यथा संभव कार्य करना चाहिए!

 मेरा यह भी मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर,  हम सबके इस जीवन काल में, इस कोरोनावायरस रूपी महामारी ने, पूरी मानव जाति को, अनेकों विषयों पर एक साथ चिंतन और मानवता की सेवा करने के लिए, अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए एक अच्छा अवसर दिया है.

 परिस्थितिजन्य कारणों को यदि स्वीकारोक्ति के सिद्धांत से पालन किया जाए और उसके अनुरूप अपने चिंतन और समाज की सेवा का दायित्व स्वीकार किया जाए तब विगत जीवन-वर्षों में कमाए हुए धन और ज्ञान का सच्चा सदुपयोग उसको बांटने और शिक्षा और संस्कार के प्रचार प्रसार के लिए किया जाना एक अभिनव संदेश आने वाली पीढ़ियों को दे सकता है.

 मेरा यह भी मानना है शिक्षा के लिए चलाये गए पूर्व अनुप्रयोगों और सरकारी तथा गैर सरकारी गतिविधियों के द्वारा विगत 70 सालों में देश ने बहुत कुछ सीख लेकर समझा है और अगला कदम प्रत्येक व्यक्ति का कैसा हो.. और प्रत्येक व्यक्ति की प्रासंगिकता देश के शिक्षा अभियान को बल देने के लिए कैसी हो सकती है, इसको अपनाना शुरू हो चुका है.

मेरा यह मानना है कि मात्र सरकारों और उनकी नीतियों पर निर्भर रह कर तथा प्राइवेट इंस्टीट्यूशंस के द्वारा आरोपित संसाधनों के आर्थिक भार को न स्वीकार करने की दशा में, सर्व शिक्षा अभियान अपने साथ न्याय नहीं कर पाएगा. सरकारी और गैर सरकारी तौर तरीकों से हमने बहुत कुछ सीख लिया है परंतु अपनी क्षमता का सदुपयोग जब तक प्रत्येक व्यक्ति अपने आसपास,अपने द्वारा विस्तारित नहीं करेगा, वर्तमान और आने वाली जनसंख्या घनत्व को पूरी तरह से  साक्षर बनाने के लिए कभी भी सफल नहीं होगा.

मेरा यह भी मानना, बहुत अन्यथा नहीं है कि कि सरकारी और गैर सरकारी प्रबंधन के बावजूद जब तक व्यक्ति समाज के लिए स्वयं अपनी उपलब्धता नहीं घोषित करेगा, उसके आसपास संकीर्ण मानव समाज का निर्माण होता रहेगा और उसके अनुरूप उसको स्वयं को परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ेगा. ऐसी विकट परिस्थितियों में आने वाले 50 साल में, प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने अनुकूल राष्ट्र शिक्षक के दायित्व को निर्वहन करने के लिए तैयार हो जाए, तब यह देश विश्व गुरु के पद पर स्थापित हो सकता है. और यदि यह दायित्व निर्वहन नहीं किया तब एक निरक्षर समाज को दिशाहीन जीवन जीने से रोक भी नहीं सकता.

 पिछले 2 वर्षों में मेरे द्वारा किए गए सामाजिक और वैज्ञानिक अनुप्रयोगों और हमारी टीम डॉ सत्या होप टॉक, मीट के द्वारा संकल्पित कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्य लोगों के द्वारा जो प्रेरणा और शाब्दिक ऊर्जा दी गई है, और जिसका अनुप्रयोग सामान्य व्यक्ति से लेकर राष्ट्र के वरिष्ठ शिक्षक साहित्यकार और समाजसेवी कर रहे हैं, उन पर यदि सम्यक दृष्टि डाली जाए, तो यह दृष्टिगोचर होता है कि मात्र एक छोटे से प्रयोग, आपकी “सतत  सोशल मीडिया अभिव्यक्ति”  का अनुप्रयोग आपके आसपास धनात्मक ऊर्जा का संप्रेषण तथा मानव मूल्यों की स्थापना करने में महती भूमिका निभा रहा है.

 यह मार्ग न केवल अत्यंत सस्ता तथा साध्य है बल्कि इसके लाभ बहुत ही दूरगामी है.

जिस प्रकार से एक व्यक्ति से दूसरा व्यक्ति सोशल मीडिया के द्वारा जुड़ा हुआ है, और प्रत्येक मनुष्य की पहुंच वैश्विक रूप से स्थापित होकर हमारी आपकी अभिव्यक्ति दूसरे के लिए प्रेरणा का काम करती है, यह परिकल्पना पूरी तरह से ओपन विश्वविद्यालय की तरह काम कर रही है.

 सोशल मीडिया का डिटॉक्सिफिकेशन इस प्रोजेक्ट का दूसरा भाग भी है, जिसके द्वारा द्वारा हम अपने आसपास धनात्मक ऊर्जा का सतत संप्रेषण करके, पुरे सोशल मीडिया को धनात्मक ऊर्जा से भरते हैं. जिस प्रकार से अच्छी चीज को अपनाने की प्रगति बहुत ही धीरे होती है, लेकिन वह दीर्घकाल में समाज के द्वारा स्वीकार की जाती है; हम सब के द्वारा दिया गया वर्तमान का  संप्रेषण भी आने वाले 10 वर्षों में सहज रूप से स्वीकार कर लिया जाएगा.

 आने वाली युवा पीढ़ी निश्चित रूप से इसको अपने संस्कार में रखना एक गौरव का विषय मानेगी और राष्ट्रीय चिंतन में आने वाली पीढ़ियां अपना योगदान करना जारी रखेंगी.

 आज के समय में इस से सुंदर सहज स्वीकार्य कार्यक्रम दूसरा कोई नहीं है, जिसमें घर बैठे लाकडाउन की परिस्थितियों में भी हम मानवता की सेवा करने में सक्षम हो पा रहे हैं.

 महामना पंडित मदन भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय जी की अभिलाषा राष्ट्र के लिए, और मानव जाति के लिए बहुत ही उन्नत रही है, और उनकी जीवंत विग्रह कार्यशाला  “काशी हिंदू विश्वविद्यालय” राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवता के लिए स्वयंसेवक तैयार करने के लिए अपने स्थापना काल से ही कार्य कर रही है!

 पिछले वर्षों में विश्व के कोने कोने में महामना प्रांगण से निकले हुए विद्यार्थी और कर्मचारी महामना की अभिलाषा को अपनाकर अच्छे संस्कार और अच्छी शिक्षा के लिए सदा ही कार्य कर रहे हैं. वर्तमान में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक के पद पर काम करते हुए और महामारी कालखंड में क्लिनिकल ट्रायल में आवश्यक समय-अवधि को ध्यान में रखकर, हमने इन वैश्विक सोशल मीडिया कार्यशालाओं का  निर्माण किया, जिससे की निश्चित रूप से ही वैक्सीन और दवा का प्रबंध होने तक प्रत्येक व्यक्ति अपने को धनात्मक ऊर्जा में रखते हुए अपने चिंतन को समाज के लिए खर्च करें तथा प्राप्त किये गए मानसिक स्वास्थ्य के कारण “रोग प्रतिरोधक क्षमता” का विकास भी अपने अंदर कर पाए,

 मेरा यह परिकल्पना का प्रोजेक्ट, भी पूरी तरह सफल रहा है और हमारे साथियों का यह मानना है कि पिछले 2 वर्षों में उन्होंने मीट कार्यशालाओं के माध्यम से अपने मानसिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने के पश्चात, अपने शारीरिक ऊर्जा में उन्नति महसूस की है. प्रत्येक दिवस इन कार्यशाला में अच्छे विचारों को सुनना तथा प्रस्तुति करना, सामान्य से लेकर अति विशिष्ट लोगों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करने तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए उपयोगी पाई गई है.

 महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने त्याग भावना को स्थापित करने तथा जन जन की भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए भीख मांगने का कार्य किया तथा भिक्षा मांग कर उन्होंने इतने बड़े शिक्षा अनुष्ठान को संपादित किया.

 परन्तु उनके इस गुण को समाज ने स्वीकार नहीं किया तथा किसी अच्छे काम को करने के लिए भीख का मांगना और देना बहुत कम हो पा रहा था. महामना के द्वारा किए गए इस दुरूह कार्य की प्रशंसा हमेशा ही सामान्य से लेकर वरिष्ठ लोगों ने किया है, परन्तु किसी कार्य में अच्छाई देखना और उसे अपना कर राष्ट्र की सेवा करना दो बातें होती हैं.

 राष्ट्रीय मूल्यों की स्थापना करने के लिए तथा प्रत्येक व्यक्ति को इसका सतत भागीदार बनाने के लिए, जुड़े हुए व्यक्तियों से अन्य को जोड़ने की प्रेरणा देने वाला यह कार्यक्रम सभी को सदस्यता लेने और अपना प्रतिभाग आर्थिक तथा वैचारिक सतत उपलब्ध कराने की भावना के साथ आगे बढ़ रहा है. मुझे विश्वास है कि 2022 में सर्व शिक्षा अभियान और ऊंचाई को प्राप्त करेगा तथा देश के कोने कोने में हमारे साहित्यकार और शिक्षाविद अपने अनुप्रयोगों से समाज को दिशा देने में समर्थ होंगे.

आज सोशल मीडिया का  और मोबाइल नेटवर्क की उपलब्धता जहां नहीं है वहां भी अगले 10 वर्षों में यह सहज रूप से होगी! और हम सब के द्वारा किया गया, यह कार्य उन सभी लोगों के लिए अप्रत्याशित और विचार का विषय रहेगा जो बाद में इन चीजों को देखेंगे और अपनाएंगे!!

 ऐसी भावनाओं के साथ प्रत्येक दिवस अपने साथ जुड़े लोगों को, राष्ट्र की सेवा करने का अवसर देने वाला यह कार्यक्रम “डॉ सत्या होप टॉक”, महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी की 160 वीं जन्म जयंती 25 दिसंबर को, जब पूर्व प्रधानमंत्री और कवि  श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेई जी की भी जन्म जयंती है, पर इन दोनों मनीषियों को श्रद्धांजलि ज्ञापित करता है.

 इस कार्यक्रम को अटल विश्वास है, अपने से जुड़े हुए साथियों पर तथा निकट भविष्य में इस कार्यक्रम से जुड़ने वाले साथियों पर!!उनकी अभिव्यक्ति और प्रतिभा जिसे टैलेंट भी कहा जाता है, के माध्यम से ही, इन कार्यशालाओं का जनहितकारी उपयोग सिद्ध होगा.

 मैं अपनी बात निम्न सूक्ति से पूरी करता हूं :

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्

डॉ सत्य प्रकाश
वैज्ञानिक काशी हिंदू विश्वविद्यालय
संस्थापक: डॉ सत्या होप टॉक, मीट, कवि के साथ कॉफी एवं अन्य

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