एक अनछुआ एहसास : स्मिता श्रीवास्तव

ये उम्मीद के बादल, जिनसे बरसती हैं सुकून की बूंदें खिल जाती है मुस्कान, समृद्ध हो जाती है धरती हरे रंग से
आ ही जाती है हरियाली उस उपेक्षित स्मृति में
जो सकुलेन्ट पौधे की भांति धूप के त्रास को सहते हुए जीवित रहते हैं।
कुछ लम्हें ऐसे होते हैं जो अकारण ही मन, मस्तिष्क में लिपिबद्ध हो जाते हैं और सदियों तक शाश्वत रहते हैं, जैसे उस बारिश में साइमन कुजनेट्स के नोट्स के साथ तपते बुखार में तुम्हारा आना…

उन प्रश्नों के हल ने मुझे भाव से संबंधित प्रश्नों में उलझा दिया, तुमने उम्मीद के बीज को मन के उपजाऊ भूमि में फेंक दिया था ,जो स्वत: अंकुरित हो गयी थी, फिर तुम्हारे ही उपेक्षा की तपिश ने उसकी हरीतिमा छीन ली।
‌ इस नकारात्मक एहसास ने मुझे एक उर्जान्वित और मजबूत प्रेयसी का रुप दे कर मुझे सकारात्मकता के एहसास से भर दिया, प्रेम कभी भी विवशता का विषय नहीं रहा, वह बंधनों से मुक्त ,स्वतंत्र है।

स्मिता श्रीवास्तव, कंचनपुर वाराणसी