Dev Deepawali: भगवान शिव ने साधु वेश में काशी में किया गंगा स्नान, 237 वर्ष पहले रानी अहिल्याबाई होल्कर ने की थी शुरुआत, जानिए इसका इतिहास

आज देव दीपावली है. देव दीपावली से समझ में आ ही गया होगा होगा कि देव दीपावली अर्थात् देवताओं की दीपावली. प्रत्येक वर्ष कार्तिक महीने के पूर्णिमा के दिन देव दीपावली मनाई जाती है. लेकिन ईद बार देव दीपावली चन्द्रग्रहण के कारण एक दिन पहले मनाई जा रही है. आज काशी दुल्हन की तरह सजी हुई है.

आज शाम काशी में उत्तरवाहिनी गंगा के अर्धचंद्राकार 85 से ज्यादा घाटों पर देवता स्वर्ग से आएंगे और दीपावली मनाएंगे. संत रविदास घाट से लेकर आदिकेशव घाट तक और वरुणा नदी के तट से लेकर मठों-मंदिरों तक 10 लाख दीये जगमगाएंगे. काशी की देव दीपावली इसलिए खास है, क्योंकि पुराणों से लेकर इतिहास तक इसका जिक्र है. वैसे तो देव दीपावली के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध कर धरती और स्वर्ग को संकटमुक्त किया था. लेकिन देव दीपावली से जुड़े कई इतिहास हमारे धरोहरों में छिपे हुए हैं. आज हम उसी इतिहास के बारे में जानेंगे

त्रिपुरासुर का वध

भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया था. उसके बाद तारकासुर के तीन पुत्रों ने देवताओं से बदला लेने का निश्‍चय कर लिया. तीनों असुरों के नाम थे – तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्‍माली. देवताओं को पराजित करने के उद्देश्‍य से तीनों तपस्‍या करने के लिए जंगल में चले गए. उन्‍होंने हजारों वर्ष तक अत्‍यंत कठोर तप किया. उनके कठोर तप से ब्रह्माजी प्रसन्‍न हुए और उनके सामने प्रकट हो गए. तीनों ने ब्रह्माजी का वंदन किया और कहा, ‘‘ब्रह्माजी हमने आपको प्रसन्‍न करने के लिए कठोर तप किया है. आप हमें अमरता का वरदान दें.’’ तब ब्रह्माजी बोले, ‘‘मैं आपको अमरता का वरदान नहीं दे सकता; परन्‍तु तुम कोई ऐसी शर्त रख लो, जो अत्‍यंत कठिन हो, जिसके पूर्ण होने पर ही आपकी मृत्‍यु होगी. उसका वरदान मैं तुम्‍हें दे सकता हूं.’’

भगवान शिव ने एक ही बाण से तीनों नगरों का विध्वंस कर दिया था

तीनों ने बहुत विचार किया और ब्रह्माजी से वरदान मांगा, ‘‘हे प्रभु ! आप हमारे लिए तीन तारों पर तीन नगरों का निर्माण करें. वे तीनों तारें अर्थात नगर जब अभिजित नक्षत्र में एक पंक्‍ति में आएंगे और उसी समय कोई व्‍यक्‍ति अत्‍यंत शांत अवस्‍था मे हमें मारेगा, तभी हमारी मृत्‍यु होगी और हमें मारने के लिए उस व्‍यक्‍ति को एक ऐसे रथ और बाण की आवश्‍यकता होगी जो बनाना असंभव हो. केवल उससे ही हमारी मृत्‍यु हो.’’ उनकी इच्‍छा सुनकर ब्रह्माजी ने कहां, ‘‘तथास्‍तु ! आप तीनों के इच्‍छा के अनुसार ही होगा.’’

तीनों असुरों को मिले वरदान के अनुसार ब्रह्माजी ने उन्‍हें तीन तारों पर तीन नगर निर्माण करने के लिए विश्‍वकर्माजी को आज्ञा दी. विश्‍वकर्माजी ने तारकाक्ष के लिए स्‍वर्णपुरी, कमलाक्ष के लिए रजतपुरी और विद्युन्‍माली के लिए लौहपुरी का निर्माण कर दिया. ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्‍त होने के बाद तीनों असुर उन्‍मत्त हो गए. उन्‍होंने सातों लोकों में आतंक मचाया. इन तीनों असुरों को ही त्रिपुरासुर कहा जाता था. त्रिपुरासुर जहां भी जाते वहां सज्‍जनों को सताते रहते. उन्‍होंने देवताओं को भी देवलोक से बाहर निकाल दिया.

त्रिपुरासुर के आतंक से त्रस्‍त होकर उन्‍हें हराने के लिए सभी देवता एकत्रित हुए. सभीने अपना सारा बल लगाया, परन्‍तु त्रिपुरासुर का प्रतिकार नहीं कर सके. अंत में सभी भगवान शिवजी के शरण में गए. देवताओं ने कैलाश पर्वत पर जाकर शिवजी को पूरा वृत्तांत बताया. तब भगवान शंकर ने कहा, ‘‘आप सभी देवता मिलकर प्रयास करें.’’ देवताओं ने कहा, ‘‘प्रभु, हम सभी ने मिलकर त्रिपुरासुर का वध करने का प्रयास किया, परंतु कुछ नही कर पाएं. हम आपकी शरण में आए है. आप ही हमारी रक्षा कर सकते है.’’ तब शिवजीने कहा, ‘‘मैं अपना आधा बल तुम्‍हें देता हूं. इस बल की सहायता से प्रयास करके देखो.’’ शिवजीने अपना आधा बल देवताओं को दिया; परन्‍तु देवता उनका आधा बल सहन नही कर पाएं. तब शिवजी ने स्‍वयं त्रिपुरासुर का संहार करने का संकल्‍प लिया.

अब त्रिपुरासुर का वध करने के लिए रथ और धनुष बाण सिद्ध करना आवश्‍यक था. भगवान शिवजीने पृथ्‍वी को ही उनका रथ बनाया. सूर्य और चन्‍द्रमा को उस रथ के पहिए बनाए. सृष्‍टा सारथी बने, भगवान विष्‍णु बाण बनें, मेरू पर्वत धनुष और वासुकी बने उस धनुष की डोर. सभी देवताओं ने अपने बल से वह रथ संभाल लिया. इस प्रकार असंभव रथ सिद्ध हुआ.

भगवान शिवजी उस रथ पर सवार हुए, उनकी शक्‍ति के कारण वह रथ भी डगमगाने लगा. तभी विष्‍णु भगवान वृषभ बनकर उस रथ में जुडे. घोडों और वृषभ की पीठ पर सवार होकर महादेव ने उस असुर नगरों को देखा. अपने धनुष्‍य पर बाण रख उन्‍होंने पाशुपत अस्‍त्र का संधान किया और तीनों तारों को (नगरों) को एक पंक्‍ति में आने का आदेश दिया.

अभिजित नक्षत्र में तीनों नगर एक पंक्‍ति में आते ही भगवान शिवजी ने अपने बाण से तीनों नगरों को जलाकर भस्‍म कर दिया. इसमें तीनों आसुरों का भी अन्‍त हो गया. तभी से भगवान शिवजी त्रिपुरांतक बन गए. त्रिपुरांतक का अर्थ है – तीन पुरों का अर्थात नगरों का अंत करनेवाले. भगवान शिवजी ने जिस दिन त्रिपुरासुर का वध किया वह दिन था कार्तिक पूर्णिमा.

भगवान शिव ने काशी में गंगा स्नान किया

स्कंद पुराण के काशीखंडम के अनुसार, काशी में देव दीपावली मनाने के संबंध में मान्यता है कि राजा दिवोदास ने अपने राज्य काशी में देवताओं के प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया था. कार्तिक पूर्णिमा के दिन भेष बदलकर भगवान शिव काशी के पंचगंगा घाट पर आकर गंगा स्नान किए. यह बात राजा दिवोदास को पता लगी तो उन्होंने देवताओं के प्रवेश के प्रतिबंध को समाप्त कर दिया था. इससे देवता खुश हुए और उन्होंने काशी में प्रवेश कर दीप जलाकर दीपावली मनाई थी.

पंचगंगा घाट से शुरू हुई परम्परा

काशी के पंचगंगा घाट को लेकर मान्यता है कि यहां गंगा, यमुना, सरस्वती, धूतपापा और किरणा नदियों का संगम है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन पंचगंगा घाट पर स्नान विशेष पुण्यदायी माना जाता है. काशी के ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, यहां देव दीपावली की शुरुआत भगवान शिव की कथा से जुड़ी है. मगर, घाटों पर दीप प्रज्ज्वलित होने की कथा पंचगंगा घाट से जुड़ी है.

साल 1785 में आदि शंकराचार्य से प्रेरणा लेकर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराने वाली महारानी अहिल्याबाई होलकर ने पंचगंगा घाट पर पत्थर से बने हजारा स्तंभ (एक हजार एक दीपों का स्तंभ) पर दीप जलाकर काशी में देव दीपावली उत्सव की शुरुआत की थी. इसे भव्य बनाने में काशी नरेश महाराज विभूति नारायण सिंह ने मदद की.

केंद्रीय देव दीपावली महासमिति के अध्यक्ष पं. वागीश दत्त शास्त्री के अनुसार, नेपाल से आकर बनारस में बसे पं. नारायण गुरु ने साल 1984 में श्रद्धा भाव से किरणा-गंगा संगम स्थल पर 5 दीये जलाए थे. अगले साल घर-घर से तेल मांग कर उन्होंने पंचगंगा घाट से हजारा दीपोत्सव (1001 दीप जलाकर) मनाया. इस वर्ष 37 साल बाद 7 नवंबर को काशी के गंगा घाटों पर देव दीपावली पहले से भी ज्यादा भव्य और दिव्य रूप में मनाई जाएगी.