बाबरी मस्जिद विध्वंस: कौन थे कोठारी बंधु? जिन्होंने बाबरी मस्जिद के गुम्बद पर सबसे पहले फहराया था भगवा झंडा

बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी पर देश के तमाम हिन्दू संगठन कोठारी बंधुओं को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं. 6 दिसंबर 1990 को अयोध्या में भीड़ के द्वारा विवादित ढांचा गिराया गया था. कार्यसेवकों ने महज 17 से 18 मिनट के अंदर ही बाबरी मस्जिद को ढाह दिया था. विध्वंस से पहले 30 अक्टूबर 1990 को बाबरी मस्जिद के गुम्बद पर शरद और रामकुमार कोठारी नाम के दो भाइयों ने सबसे पहले भगवा झंडा फहराया था.

राममंदिर आंदोलन में दोनों भाइयों का था अहम योगदान

वर्ष 1990 एक दूर के अतीत की तरह लगता है। अयोध्या में 21 अक्टूबर से 30 अक्टूबर 1990 तक लाखों की संख्या में कारसेवक विवादित स्थल की ओर जाने के तैयारी में थे. स्थल के चारों तरफ और पुरे अयोध्या में यूपी पीएसी के करीब 30 हजार जवान तैनात किए गए थे. इन कारसेवकों का नेतृत्व अशोक सिंघल, उमा भारती, विनय कटियार जैसे नेता कर रहे थे, जो सुबह 10 बजे कर्फ्यू के बीच चारों दिशाओं से बाबरी मस्जिद की ओर बढ़ने लगे. पुलिस प्रशासन को चुनौती देते हुए दोनों भाई बाबरी मस्जिद की गुबंद पर चढ़ गए थे और भगवा झंडा लहराकर आराम से नीचे उतर गए थे. दोनों भाइयों ने पहली बार बाबरी मस्जिद पर भगवा झंडा लहराकर कारसेवकों के बीच सनसनी फैला दी थी.  इसके बाद पुलिस फायरिंग में दोनों भाइयों की मौत हो गई थी. राममंदिर आंदोलन में इस अहम योगदान के लिए इस दोनों भाइयों की अक्सर चर्चा की जाती है.

रामकुमार कोठारी और शरद कोठारी की तस्वीर के साथ उनकी बहन पूर्णिमा कोठारी
दोनों सगे भाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक से जुड़े थे

रामकुमार कोठारी और शरद कोठारी कोलकाता के बड़ा बाजार के निवासी थे. दोनों सगे भाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक से जुड़े थे. अयोध्या राम मंदिर आंदोलन (1990) में दोनों भाइयों ने कारसेवा में शामिल होने का फैसला लिया. अयोध्या में उन दिनों राममंदिर आंदोलन अपने चरम पर था. विश्व हिंदू परिषद के आव्हान पर देश के कोने-कोने से लोग अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए हो रही कारसेवा में शामिल हो रहे थे. राम और शरद कोठारी ने 22 अक्टूबर की रात कोलकाता से ट्रेन पकड़ी. वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हेमंत शर्मा की किताब “अयोध्या के चश्मदीद” के अनुसार वे बनारस आकर रुक गए, सरकार ने समस्त ट्रेन और बस सेवाएँ बन कर रखीं थीं. वे टैक्सी से आजमगढ़ के फूलपुर कस्बे तक आए और उसके बाद 25 अक्टूबर को पैदल अयोध्या के लिए निकल पड़े.

पुलिस फायरिंग में हुई थी कोठारी भाइयों की मौत
ट्रेन और बस सेवा बंद होने पर 200 किलोमीटर पैदल चल पहुंचे अयोध्या

तक़रीबन 200 किलोमीटर पैदल चलने के बाद वे दोनों 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या पहुंचे. 30 अक्टूबर को सबसे पहले शरद कोठारी गुम्बद पर चढ़ा और उसके बाद रामकुमार, दोनों ने बाबरी मस्जिद पर भगवा पताका फहराया था. हेमंत कुमार की किताब के अनुसार 30 अक्टूबर को बाबरी मस्जिद की गुबंद पर भगवा लहराने के बाद 2 नवंबर को दोनों भाई विनय कटियार के नेतृत्व में हनुमानगढ़ी जा रहे थे. इसी बीच पुलिस ने फायरिंग कर दी.

शरद और रामकुमार कोठारी की बहन पूर्णिमा कोठारी
पुण्यतिथि पर कार्यक्रम के लिए अखिलेश सरकार ने नहीं दी इजाजत

दोनों भाई पुलिस की फायरिंग से बचने के लिए लाल कोठी वाली गली के एक घर में छिप गए. थोड़ी देर बाद जब वो घर से बाहर आए तो पुलिस की गोली का शिकार हो गए और वहीं दम तोड़ दिया. शरद कोठारी और रामकुमार कोठारी की बहन पूर्णिमा की दिसम्बर के दूसरे हफ्ते में शादी होनी थी. उनके पिता ने बड़ी मुश्किल से उन दोनों को कारसेवा में शामिल होने के लिए रजामंदी दी थी, साथ ही अपना हालचाल पोस्टकार्ड के जरिए लिखते रहने को कहा था. जब दोनों की मौत की खबर घर पहुंची तो पुरे परिवार में सन्नाटा छा गया. पुलिस ने दोनों के शव परिवार वालों को देने से मन कर दिया. राम कुमार और शरद के बड़े भाई ने सरयू के घाट पर 4 नवंबर को दोनों भाइयों का अंतिम संस्कार किया, जिसमें लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था. साल 2015 में कोठारी बंधुओं की बहन पूर्णिमा कोठारी अपने भाइयों की 25वीं पुण्यतिथि पर एक कार्यक्रम करना चाहती थीं किन्तु अखिलेश सरकार से इसकी इजाजत नहीं मिली.

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