“जब भीड़ सिस्टम पर हावी होती है, तब सरकारें निक्कमी हो जाती हैं” तस्वीरें बताती हैं, जब भीड़ तंत्र के आगे नतमस्तक हुई सरकार

लोकतंत्र में जनता की याददाश्त थोड़ी कमजोर होती है. ऐसा पहले भी सुना था. लेकिन इसी लोकतंत्र और कमजोर याददाश्त का फायदा उठाकर राज्य व केंद्र सरकार अपनी नाकामियां छिपा जाती हैं. और भीड़तंत्र के आगे नतमस्क हो जाती हैं.

ये भीड़तंत्र है. इससे डरना ज़रूरी है. आप शायद सोच रहे होंगे कि इतने बड़े लोकतांत्रिक देश में भीड़तंत्र कहां से आया? क्या भारत के संविधान में भीड़तंत्र को शामिल किया गया है? ऐसे कई सवाल हैं, जो नुपुर शर्मा के भाजपा के निष्कासन के बाद से जेहन में खड़े हो रहे हैं.

कर्नाटक के बेलगावी में ऊँची तार से लटकी एक पुतले की तस्वीर आपने सोशल मीडिया पर देखी ही होगी. यदि देखी होगी, तो इसके बाद आपके भीतर इसके बाद खौफ भी हुआ होगा. यदि नहीं हुआ तो भी होना ज़रूरी है. क्योंकि हमारे यहां का सिस्टम ही ऐसा कहता है. पुतले को टांगने वालों ने इसपर नुपुर शर्मा की तस्वीर भी लगाई है. इस धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश में इनके उपर इनाम की घोषणा करके कहा गया कि उनका सिर काट देना चाहिए.

फोटो साभार – सोशल मीडिया

सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही तस्वीर को देखने के बाद आपको इसके असली और नकली होने में फर्क करना बड़ा मुश्किल लग रहा होगा. दुनिया में बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जो एक महिला के साथ ऐसा करना चाहते हैं. एक अकेली महिला, जिसकी बातें उन्हें पसंद नहीं आई. जिस तरह से हमें सोचने और व्यवहार करने के लिए ढाला गया है उसके तहत हम कुछ सेकंड के लिए तस्वीर को देखते हैं और फिर हम खुद से ही कहते हैं, “नहीं, यह भारत है अफगानिस्तान या सीरिया नहीं. ऐसी चीजें यहाँ नहीं हो सकतीं”.

इसमें कुछ सच्चाई है. हाँ, अफगानिस्तान में ऐसी चीजें आम हैं. साल 2021 में सत्ता हथियाने के कुछ ही समय बाद तालिबान ने शवों को क्रेन से लटकाना शुरू कर दिया. वे तस्वीरें भी इसी तरह डरावनी थीं. एक तस्वीर सामने आई थी, जिसमें तालिबान ने एक शव को हेलीकॉप्टर से लटका दिया था. वे पुतले नहीं थे, वाकई हत्या करने के बाद लोगों में एक संदेश भेजने के लिए उनके शव को फाँसी लगाकर तमाशा बनाया गया था.

ऊपर अफगानिस्तान की जो तस्वीर आपको दिखाई दे रही है. यह कोई पुतला नहीं, बल्कि ये वास्तविक लोग हैं. अपहरण के आरोपियों को मारकर उनके शवों को जनता को देखने के लिए फांसी पर लटका दिया गया.

अब बात शुरू होती है, तो केवल और केवल नुपुर शर्मा पर आकर रुक जाती है. क्योंकि नुपुर के साथ जो हुआ वह गलत हुआ. नुपुर के खिलाफ पूरे भारत में एक विशेष धर्म के लोग उपद्रव कर रहे हैं. ‘सर तन से जुदा’ और ‘रेप’ करने तक की धमकियां दी जा रही हैं. उपद्रवियों में से कुछ लोग चाहते हैं कि पहले नुपुर शर्मा का बलात्कार हो, फिर सिर कलम किया जाय. यह डरावना पुतला इसी इरादे की खुलेआम घोषणा है.

अभी कुछ समय पहले जम्मू के एक मस्जिद में मौलवी ने लाउडस्पीकर से आवाज़ लगाई कि नुपुर शर्मा का सिर कलम कर देना चाहिए. साथ ही मौलवी ने यह भी कहा कि गोमूत्र पीने वाले हिन्दू मुस्लिमों से बराबरी के योग्य नहीं हैं. इसके साथ ही पश्चिम बंगाल और रांची में भी उपद्रवी नुपुर शर्मा के विरोध में खड़े हुए. मौलाना उलेमाओं और नेताओं ने खुले तौर पर घोषणा किया है कि नुपुर शर्मा जीने की हक़दार नहीं है.

शासन-प्रशासन चुप है. कानून-व्यवस्था तोड़ने के आरोप में यहाँ-वहाँ कुछ गिरफ्तारियाँ हुई हैं और धार्मिक नफरत फैलाने के आरोप में कुछ एफआईआर भी दर्ज हुई हैं, लेकिन क्या ये काफी हैं? अभी ज्यादा पीछे न जाएं तो क्या हमने पालघर के साधुओं का चेहरा भुला दिया? जिन बेगुनाह साधुओं की बुद्धिजीवियों ने पीट-पीट कर हत्या कर दी. और जिसमें किसी भी तरह की कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई.

कल्पवृक्ष गिरि महाराज 70 वर्ष के थे. अपने कमजोर हाथों से को जोड़ते हुए एक पुलिस अधिकारी से बचाने की गुहार लगाई थी और अपने झुर्रीदार चेहरे के साथ इस उम्मीद में वे मुस्कुराए थे कि राज्य की शक्ति के रूप में कई वर्दीधारी पुलिस अधिकारी उनके सामने मौजूद हैं, जो खून की प्यासी भीड़ से उनकी रक्षा कर लेगी. लेकिन, वह कुछ कुछ ही सेकंड में गलत साबित हो गया. जब भीड़ उन्हें और उनके सहयोगी को पीट-पीट कर मार डाला और उनके शवों को भी नहीं छोड़ा तब भी पुलिस देख रही थी.

पालघर की घटना के 2 साल हो चुके हैं. इस घटना में सरकार असफल साबित हुई थी. सत्ताधारी दल के नेताओं ने कभी भी इस मामले में कुछ नहीं कहा. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को छोड़कर किसी भी प्रमुख नेता ने कभी उनका जिक्र नहीं किया और ना ही उन साधुओं के लिए शोक व दुख व्यक्त किया. कल्पवृक्ष गिरि महाराज यह विश्वास लिए हुए भीड़ के हाथों मारे गए कि सरकार उन्हें बचा लेगी.

लखबीर सिंह का क्या दोष था? जिसे किसान आन्दोलन कर दौरान मार कर लटका दिया गया. और जिसे आज भी इंसाफ नहीं मिला. लखबीर शायद इतना साक्षर या जागरूक नहीं था कि उसे विश्वास हो जाए कि उसे बचा लिया जाएगा. जबकि उसका खंडित शरीर उसके ही खून के कुंड में पड़ा था. उसकी आँखें सदमे से फैल गई थीं. वह इशारे से बोलने की कोशिश करता रहा. संभवत: वह बचाए जाने, मदद करने या कुछ पानी दिए जाने की याचना कर रहा था.

मारकर लटकाया गया लखबीर सिंह का शव

लखबीर के हमलावरों ने उसकी हत्या का तमाशा भी बना लिया था. उन्होंने निष्प्राण पड़े उसके शरीर के चारों ओर अपनी तलवारें लहराते हुए क्रूरता का नृत्य किया. उन्हें सरकार का कोई डर नहीं था. हेरात की अनाम लाशों की तरह ही लखबीर को पुलिस के बैरिकेड्स के मचान से बाँध दिया गया और सभी लोगों के देखने के लिए छोड़ दिया गया था.

आधुनिक तकनीक, देश चलाने के लिए जबरदस्त जनादेश, ताकतवर सुरक्षाबल और सूचनाएँ उपलब्ध होने के बावजूद सरकार पालघर में साधुओं की हत्या और किसान आंदोलन के दौरान सिंघु-कोंडली बॉर्डर पर लखबीर सिंह की निर्मम हत्या के मामले में राज्य की सत्ता विफल साबित हुई.

महीनों तक लोगों ने पीएम को मारने और काटने की धमकी दी, बलात्कार की घटनाएँ सामने आईं, यातायात रोक दिया गया और किसानों के विरोध के नाम पर पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया और सरकार देखती रही. जब लाल किले में तिरंगा फहराया गया और पीला झंडा लगा दिया गया, तब भी सरकार देखती रही.

चूँकि सरकार का अपमान और दुर्बलता सभी को दिखाई दी थी और जब लाल किले की ऊँची दीवारों से दर्जनों पुलिस अधिकारियों को नीचे गिराया गया तब पूरी दुनिया इसे देख रही थी. सरकार ने अराजकतावादियों के सामने हार मान ली थी. जिस दिन गणतंत्र अपना संविधान मनाता है, उसी दिन लोकतंत्र के प्रतीकों को अशुद्ध कर दिया गया था.

तस्वीरें शक्तिशाली होती हैं. ये मन-मस्तिष्क में बैठ जाती हैं. तस्वीरें कहानियाँ बताती हैं. दुर्भाग्य से हमारे लिए ऐसी बहुत सी तस्वीरें हैं, जो किसी सरकार के कमजोर होने और भीड़ के सामने बेबस एवं लाचार होने की कहानी बयाँ कर सकती हैं. जब सरकार कमजोर होती है तो उस स्थान पर अराजकतावादी, कट्टरपंथी और शैतान कब्जा कर लेते हैं. अराजकता महामारी की तरह फैलती है. निराशा टिड्डियों की तरह पैदा होती है.

कट्टरता एक फिसलन भरी ढलान है. अराजकता एक अंधकारमय स्थान है. यहाँ कानून और व्यवस्था का अस्तित्व समाप्त हो जाता है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कट्टरपंथी किस किताब से आदेश लेते हैं या अराजकतावादी किस टूलकिट का पालन करते हैं.

राज्य की शक्ति ही जनता को कट्टरता और अराजकता के खतरे से बचा सकती है. जब उस राज्य की शक्ति अराजकता को रोकने में विफल हो जाती है तो कट्टरता बढ़ जाती है. मानव पर भ्रष्टता हावी हो जाती है और मनुष्य शैतान बन जाते हैं. उसके बाद पुतलों को वास्तविक शरीर बनने में केवल कुछ ही समय लगता है.