जब 2 सीटें जीतने पर उड़ाई गई थी भाजपा की खिल्ली, राजनीति के महान योद्धा वाजपेयी की जयंती पर जानें किस्सा

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री व भारतीय राजनीति के महान योद्धा अटल बिहारी वाजपेयी की आज 97वीं जयंती है. अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर, 1924 को वर्तमान मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था. 2014 से वाजपेयी जी की जयंती को हर साल सुशासन दिवस के रूप में मनाया जाता है. वे एक वाक्पटु वक्ता और विपुल लेखक थे. वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और बाद में आरएसएस से जुड़े जनसंघ के सक्रिय सदस्य थे.

ग्वालियर की सीट से हुई हार

जनसंघ के उम्‍मीदवार के तौर पर 1971 में उन्‍होंने ग्‍वालियर लोकसभा सीट जीती थी. इसके बाद कांग्रेस की आंधी में माधवराव सिंधिया से 1984 में वे चुनाव हार गए थे. माधवराव सिंधिया के ग्‍वालियर से चुनाव लड़ने की खबर आते ही वाजपेयी जी चौंक गए थे, क्योंकि उसे ग्वालियर से हरा पाना लगभग नामुमकिन था. ग्वालियर की महारानी राजमाता विजय राजे सिंधिया वाजपेयी को समर्थन दे रही थीं. नामांकन के अंतिम दिन माधवराव ने ग्‍वालियर लोकसभा सीट से नॉमिनेशन पेपर फाइल किए थे. कहा जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कहने पर सिंधिया ने ऐसा किया था. इसके पहले तक वाजपेयी का वहां से जीतना करीब-करीब तय माना जा रहा था. सिंधिया ने वाजपेयी को 1.65 लाख वोटों से बुरी तरह हराया था.

जब राजीव गाँधी ने उड़ाई भाजपा की खिल्ली

बीजेपी के 2 सदस्यों के सामने कांग्रेस के 426 सदस्य थे. उन दिनों परिवार नियोजन का नारा था- हम दो हमारे दो. इसी नारे का इस्‍तेमाल राजीव गांधी ने भाजपा की खिल्‍ली उड़ाने के लिए किया था. सभी ने ठहाके लगाए थे तथा पार्टी के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी शर्मसार थे. इस हार ने जले पर नमक डालने का काम किया था. उन्‍होंने पार्टी के अध्‍यक्ष पद से इस्‍तीफा देने की पेशकश की थी जिसे अस्‍वीकार कर दिया गया था.

लखनऊ से 5 बार जीते
साल 1984 की इस हार के बाद वे ग्‍वालियर से कभी नहीं लड़े. इसके बाद 1991 में उन्‍होंने मध्‍यप्रदेश की विदिशा और उत्‍तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लोकसभा चुनाव लड़ा. उन्‍होंने दोनों सीटें जीत लीं. लेकिन लखनऊ सीट को अपना लिया और विदिशा सांसद के तौर पर सीट छोड़ दी. वह लगातार पांच बार इस सीट से जीते.

वाजपेयी के संघर्ष की झलक उनकी कविता में दिखती है-

‘हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं’

“इतिहास स्वयं को दोहराता है”
इतिहास स्वयं को दोहराता है. सन् 1984 में दो सीट से शुरू हुआ बीजेपी का कारवां 2004 और 2009 के चुनाव को छोड़ बढ़ता चल गया. कांग्रेस देश में सिमटती चली गई तथा वाजपेयी पार्टी की धुरी बने रहे.

देश के दिग्गज नेताओं ने दी श्रद्धांजलि

अटल जी की 97वीं जयंती पर देश के तमाम बड़े नेताओं ने सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि दी है.

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