राष्ट्रीय युवा दिवस: जब शिकागो के धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने दिया था ऐतिहासिक भाषण, पढ़ें रोचक कहानी

राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देश आज स्वामी विवेकानंद की 155वीं जयंती मना रहा है. भारत के महानतम आध्यात्मिक नेताओं में से एक स्वामी विवेकानंद ने वेदांत और योग के भारतीय दर्शन को पश्चिमी देशों से परिचित कराया था. उनका जन्म पश्चिम बंगाल के एक साधारण परिवार में 12 जनवरी 1863 को हुआ था. वह 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद में अपने प्रसिद्ध भाषण के बाद पश्चिमी दुनिया में लोकप्रिय हो गए. वे 19 वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी रामकृष्ण के मुख्य शिष्य और रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के संस्थापक थे. आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर जानते हैं उनके जीवन से जुडी एक दिलचस्प कहानी जिससे युवाओं को सिख लेने की जरूरत है-

शिकागो जाने के लिए नहीं थे पैसे

11 सितंबर 1983 का विश्व धर्म सम्मेलन, जिसका आयोजन अमेरिका के शिकागो में किया गया था. इस भाषण को 128 साल बीत चुके हैं लेकिन आज भी इस धर्म सम्मेलन और इसमें दिए गए स्वामी विवेकानंद के भाषण को याद किया जाता है. 11 सितंबर 1983 को विश्व धर्म सम्मेलन में जाने के इच्छुक स्वामी विवेकानंद के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे वहां जाएं और कुछ दिन ठहर सकें. लेकिन जैसे तैसे उनके एक अनुयायी ने उन्हें वहां भेजा.

पूरे दो मिनट तक तालियों से गूंजता रहा आर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ शिकागो

जब स्वामी विवेकानंद वहां मंच पर पहुंचे तो लोगों के मन में उन्हें देखकर कहीं न कहीं ये सवाल था कि ये भारतीय आखिर क्या ही बोल सकता है. लेकिन जैसे ही विवेकानंद ने पहली लाइन कही उसके बाद पूरा हॉल तॉलियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया जो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था. यहां उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत हिंदी में ‘अमेरिका के भाइयों और बहनों’ के साथ की. उनके भाषण पर आर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ शिकागो पूरे दो मिनट तक तालियों से गूंजता रहा. भारत के इतिहास में यह दिन गर्व और सम्मान की घटना के तौर पर दर्ज हो गया.

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