जयंती विशेष: केदार से काशी तक हिन्दुओं के लिए मंदिरों और धर्मशालाओं का निर्माण, गरीबों, मुगलों के लिए बड़ी चुनौती साबित हुईं महारानी अहिल्याबाई होल्कर

हिंदुओं की जब भी बात आएगी, महारानी अहिल्याबाई का नाम सबसे पहले याद किया जाएगा. चाहे काशी विश्वनाथ मंदिर पुनर्निर्माण हो या काशी के घाटों पर देव दीपावली की शुरुआत करना या फिर इंदौर नगरी को फिर से बसाना. इसके लिए हिंदू समाज सदैव महारानी का कृतज्ञ रहेगा. हिन्दू सभ्यता की रक्षा के लिए महारानी अहिल्या बाई होल्कर को इतिहास सदैव याद रखेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का निर्माण कराया तो उसमें उन्होंने महारानी अहिल्याबाई की प्रतिमा भी स्थापित करवाई. क्योंकि सन 1780 में काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनः निर्माण इन्होंने कराया था.

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर प्रांगण में स्थापित अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमा

आइए जानते हैं इनके जीवन संघर्षों के बारे में-

वैसे तो महारानी अहिल्याबाई होल्कर हिंदुओं के लिए किसी परिचय के मोहताज नहीं है लेकिन फिर भी आज हम इनके बारे में बताने जा रहे हैं. जिन हिंदुओं को इनके बारे में अथवा इनके जीवन गाथा के बारे में पता नहीं है वे इस आर्टिकल को ध्यान से पढ़ें. 28 वर्षों (1767-1975) तक मराठा साम्राज्य की कमान संभालने वाली महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मध्य-प्रदेश के खरगोन में स्थित महेश्वर नामक शहर को होल्कर राजवंश की राजधानी के रूप में स्थापित किया. उनके पति खांडे राव होल्कर और ससुर मल्हार राव होल्कर के निधन के बाद उन्होंने मालवा के विदेशी आक्रांताओं से न सिर्फ रक्षा की, बल्कि युद्धों में स्वयं सेना का नेतृत्व किया.

मल्हार राव होल्कर के गोद लिए हुए बेटे तुकोजी राव होल्कर इस दौरान युद्ध में उनके सेनापति होते थे. देश भर में सैकड़ों मंदिरों और धर्मशालाओं के अलावा तालाबों और सड़कों का निर्माण करवाने वाली महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मुगलों द्वारा की गई क्षति को ठीक करने में अपना पूरा जीवन खपा दिया. उस समय अंग्रेज अपना पाँव पसार रहे थे, ऐसे में उन्होंने धन का सदुपयोग करने की ठानी. महाराष्ट्र के अहमदनगर के चौंडी गाँव में जन्मीं अहिल्याबाई होल्कर के पिता माकोंजी शिंदे सम्मानित धांगर परिवार से थे, जो अपने गाँव के ‘पाटिल (प्रधान)’ भी थे.

अहिल्या बचपन से ही धार्मिक कार्यों में रुचि रखती थीं. बाजीराव प्रथम के सेनापति मल्हार राव होल्कर जब पुणे जाते समय तक उस गाँव में रुके, तो मंदिर में काम करतीं अहिल्या पर उनकी नजर पड़ी. तब उनकी उम्र मात्र 9 साल थी. उन्होंने अपने बेटे से उनकी शादी का प्रस्ताव रखा. आगे उनकी सास गौमाता बाई ने उनके चरित्र को और निखारा. कुंभेर के युद्ध में पति की मृत्यु के बाद राजकाज का बोझ भी अहिल्याबाई के ही कंधे पर आ पड़ा.

उन्होंने 28 वर्षों तक शासन किया. काशी के विश्वनाथ मंदिर को उन्होंने निर्माण के बाद सोने का पत्र दान में दिया था. एक बार उनके शासनकाल में डाकुओं का वर्चस्व बढ़ने लगा तो उन्होंने राज्य के कुछ युवाओं की बैठक बुलाई, जिसमें यशवंत राव ने ये काम अपने जिम्मे लिया. रानी की छोटी सी सेना की सहायता से उन्होंने 2 वर्षों में प्रदेश को डाकुओं से मुक्त कर दिया. यशवंतराव बाद में उनके दामाद बने. राजकुमारी मुक्ताबाई का विवाह उनसे हुआ.

अहिल्याबाई होल्कर के धार्मिक कार्य

अहिल्याबाई होल्कर ने न सिर्फ काशी, बल्कि सुदूर गया और हिमालय तक पर मंदिरों के निर्माण कार्य कराए. उन्होंने गुजरात के सोमनाथ में मंदिर का निर्माण करवाया. नासिक के पश्चिम-दक्षिण में स्थित त्र्यम्बक में उन्होंने पत्थर के एक तालाब और छोटे से मंदिरों का निर्माण करवाया. गया में उन्होंने विष्णुपद मंदिर के पास ही राम, जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियों वाले एक मंदिर का निर्माण करवाया. पुष्कर में भी उन्होंने मंदिर और धर्मशाला बनवाए.

वृन्दावन में उन्होंने न सिर्फ 57 सीढ़ियों वाली एक पत्थर की बावड़ी (कुआँ) का निर्माण करवाया, बल्कि गरीबों का पेट भरने के लिए एक भोजनालय भी स्थापित किया. मध्य पदेश के भिंड में स्थित आलमपुर में एक हरिहरेश्वर मंदिर बनवाया. वहाँ मल्हार राव का निधन हुआ था. आज भी वहाँ विधि-विधान से पूजा-पाठ जारी है. गरीबों में भोजन और अन्य ज़रूरी वस्तुएँ वितरित करने के लिए उन्होंने एक ‘सदावर्त’ का निर्माण भी करवाया.

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उन्होंने हरिद्वार में भी एक पत्थर का मकान बनवाया, जहाँ श्रद्धालु पिंडदान करने आते थे. हरकी पौड़ी से दक्षिण में उन्होंने इसका निर्माण करवाया. 17वीं शताब्दी के अंत में अहिल्याबाई होल्कर ने ही मणिकर्णिका घाट का निर्माण काशी में करवाया. असल में उन्होंने ‘मणिकर्णिका’ नामक कुंड बनवाया था, जिससे इस घाट का नामकरण हुआ. राजघाट और अस्सी संगम के बीच उन्होंने विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया. साथ ही दंड पाणीश्वर का पूर्व मुखी शिखर मंदिर का भी निर्माण करवाया.

बद्रीनाथ में यात्रियों के रुकने के लिए उन्होंने कई भवनों के निर्माण करवाए. लगभग 600 वर्षों तक जो छत्र भगवान जगन्नाथ की शोभा बढ़ाता रहा, उसे अहिल्याबाई होल्कर ने ही दान किया था. इसी तरह महारानी ने केदारनाथ धाम में भी एक धर्मशाला का निर्माण करवाया. देवप्रयाग में उन्होंने गरीबों के लिए भोजनालय स्थापित किया. इसी तरह गंगोत्री में उन्होंने आधा दर्जन धर्मशालाएँ बनवाई. कानपुर के बिठूर (ब्रह्मवर्त) में उन्होंने ब्रह्माघाट के अलावा कई अन्य घाट बनवाए.

काशी में उन्होंने मणिकर्णिका के अलावा एक ‘नया घाट’ भी बनवाया. वाराणसी के तुलसी घाट के पास ‘लोलार्क कुंड’ स्थित है, जहाँ हजारों वर्षों से सनातनी पूजा करते आ रहे हैं. इसे लेकर स्कन्द पुराण में भी कथा वर्णित है, जब राजा दिवोदास को काशी से विरक्त करने के लिए भगवान सूर्य यहाँ आए लेकिन खुद शिव की नगरी से मोहित हो गए. भदैनी में इसी से सम्बंधित एक कूप का निर्माण अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया. अहिल्याबाई होल्कर ने महेश्वर नगरी को इसीलिए अपना स्थान बनाया, क्योंकि ये पवित्र नर्मदा के किनारे था और इसे लेकर पुराणों में कई कथाएँ थीं.

इसी तरह मध्य प्रदेश के धार स्थित चिकल्दा में नर्मदा परिक्रमा हेतु आने वालों भक्तों के लिए उन्होंने भोजनालय की स्थापना की. सुलपेश्वर में उन्होंने महादेव के एक विशाल मंदिर और भोजनालय का निर्माण करवाया. मध्य प्रदेश के खरगोन स्थित मंडलेश्वर में उन्होंने मंदिर और विश्रामालय बनवाए. मांडू में उन्होंने नीलकंठ महादेव मंदिर की स्थापना की. ओंकारेश्वर में उन्होंने पूजा-पाठ की कई व्यवस्थाएँ की और निर्माण कार्य कराए, जो सैकड़ों वर्षों से जारी है.

मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के किनारे स्थित हडिया में भी उन्होंने उन्होंने मंदिर बनवाए और अपनी देखरेख में प्राण प्रतिष्ठा करवा कर पूजा-पाठ शुरू करवाया. साथ ही धर्मशाला और भोजनालय बनवाए. उन्होंने कोलकाता से लेकर काशी तक श्रद्धालुओं के लिए सड़क का निर्माण भी करवाया था. साथ ही कई पुल भी जगह-जगह बनवाए थे. जहाँ महारानी का जन्म हुआ था, वहाँ भी उन्होंने अहिल्येश्वर नाम से मंदिर बनवाया. ये भी नर्मदा तट पर स्थित है.

उन्होंने कितने ही गाँव, जमीन और मकानों की आमदनी की व्यवस्था की थी, जो सैकड़ों वर्षों तक चलती रही और आज भी कई जगह चली आ रही है. ग्रीष्म ऋतु में उन्होंने कई जगह प्याऊ का निर्माण करवाया. शीत ऋतु में वो गरीबों में कंबल, रजाइयाँ और गर्म कपड़ों का वितरण करती थीं. कुछ खेतों में खड़ी फसल को खरीद कर वो चिड़ियों के चुगने हेतु छोड़ दिया करती थीं. मछलियों के चारे के लिए उन्होंने लोगों की व्यवस्था की थी.