राष्ट्रपति से जवाहर लाल नेहरु का था विवाद, फिर उन्हें किसने दिया भारत रत्न?

देश में राष्ट्रपति चुनाव की चर्चा चारों और है. और हो भी क्यों न! देश की पहली आदिवासी महिला, जो अपने संघर्षों के दम पर राष्ट्रपति बनी हैं. वैसे तो राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक होता है. उसका आदेश सर्वोपरि होता है. लेकिन हमारे देश में एक ऐसे प्रधानमंत्री हुए करते थे, जिनकी राष्ट्रपति से एक क्षण नहीं बनती थी. जबकि दोनों एक ही पार्टी और एक ही विचारधारा के थे.
जी हां, आप जिनका नाम सोच रहे हैं, हम उन्हीं की बात कर रहे. हम बात कर रहे भारत के पूर्व परिधान मंत्री (प्रधानमंत्री) पं० पंडित जवाहर लाल नेहरू की.
यहां प्रधानमंत्री जैसे सम्मान जनक शब्द को कुछ और कहकर संबोधित करना, प्रधानमंत्री पद का अपमान है. लेकिन हम जिस व्यक्ति के बारे में बात करने जा रहे, उसका चरित्र ही कुछ ऐसा है कि उन्हें परिधान मंत्री कहना गलत नहीं होगा.

भले ही नेहरू जी ने खुद को भारत रत्न से सम्मनित कराया हो, लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ० राजेंद्र प्रसाद से उनकी एक न बनती थी. वह बात अलग थी कि पीएम रहते हुए नेहरु जी की जितनी राष्ट्रपति महोदय से अनबन थी. उससे कहीं अधिक माननीय नेहरु जी की अपने महिला मित्रों से बनती थी. खैर, इसके बारे में हम बाद में बात करेंगे, उससे पहले हम बात करते हैं, नेहरु और डॉ० राजेंद्र प्रसाद का नेहरु को भारत रत्न से सम्मानित करने की कहानी.

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वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई की पुस्तक ‘भारत के प्रधानमंत्रीः देश, दशा, दिशा’ में इस बात का भी उल्लेख किया है कि जिन दोनों राष्ट्रपतियों राजेंद्र प्रसाद और वी वी गिरि ने क्रमशः नेहरू और इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर रहने के दौरान ‘भारत रत्न’ दिया था, उन्हें भी पद से हटने के बाद नेहरू एवं इंदिरा की सरकार में ही देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान किया गया.
‘राजकमल प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में कहा गया है कि 1955 में जब नेहरू को ‘भारत रत्न’ देने की घोषणा की गई तो वह यूरोप के आधिकारिक दौरे पर थे. उस दौरान उन्होंने भारत के राजनयिकों को खिताब किया था और वियना में ऑस्ट्रिया के चांसलर जूलियस राब के साथ मुलाकात की थी. भारत के राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश के तहत इसे कायम किया गया था. सबसे पहले 1954 में सी राजगोपालाचारी, सीवी रमन और एस राधाकृष्णन को प्रदान किया गया था.

यह कदम मैंने स्व विवेक से लिया: डॉ० राजेन्द्र प्रसाद

पुस्तक में दावा किया गया है कि तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के संबंध उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से ठीक नहीं थे. दोनों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद थे. इसके बावजूद प्रसाद ने नेहरू को ‘भारत रत्न’ प्रदान करने की पूर्ण जिम्मेदारी स्वीकार की. इस पुस्तक के अनुसार, ‘‘15 जुलाई, 1955 को इस बाबत प्रसाद ने कहा, ’’यह कदम मैंने स्व-विवेक से, अपने प्रधानमंत्री की अनुशंसा के बगैर व उनसे किसी सलाह के बिना उठाया है, इसलिए एक बार कहा जा सकता है कि यह निर्णय अवैधानिक है, लेकिन मैं जानता हूं कि मेरे इस फैसले का स्वागत पूरे उत्साह से किया जाएगा.’’

प्रशस्ति पत्र में खाली छोड़ दिया गया था नेहरू का योगदान

नेहरू के साथ ही दार्शनिक भगवानदास व टेक्नोक्रेट एम विश्वेश्वरैया को भी भारतरत्न से विभूषित किया गया था. पुस्तक में कहा गया है, ‘‘7 सितम्बर, 1955 को विशेष रूप से निमंत्रित प्रतिष्ठित भद्रजनों के बीच एक समारोह में नेहरू को भारतरत्न से विभूषित किया गया. राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस सम्मान समारोह में तत्कालीन केन्द्रीय गृह सचिव एवी पाई ने सम्मान पाने वाली विभूतियों के नाम पुकारे, लेकिन नेहरू का प्रशस्ति-पत्र नहीं पढ़ा गया.’’ पत्रकार लिखते हैं, ‘‘प्रशस्तियों की आधिकारिक पुस्तिका में प्रधानमंत्री का महज नाम दर्ज है. उनके द्वारा की गई सेवाओं का वहां कोई जिक्र नहीं है. सामान्यतः यह उल्लेख परम्परागत रूप से उस पुस्तिका में किया जाता है. पुराने दौर के लोग कहते हैं कि देश व समाज के लिए नेहरू के अप्रतिम योगदान का चन्द पैराग्राफ में जिक्र करना कठिन होगा, इसलिए उसे छोड़ दिया गया.’’

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