75th Amrit Mahotsav: इस एक युद्ध ने बदल दिया था भारत का इतिहास, 3000 सैनिकों के आगे 50,000 सैनिकों ने टेक दिए थे घुटने

आजादी के 75वें अमृत महोत्सव एडिशन के दूसरी कड़ी में आज हम बात करेंगे कि किन कारणों से हमारा देश गुलाम बना. आखिर इतनी बड़े भारत को आखिर मुट्ठी भर अंग्रेजों ने कैसे कब्जा कर लिया ? आखिर अंग्रेजों ने भारतीयों की कौन सी नस पकड़ ली, जिससे उन्होंने समूचे भारत पर कब्जा कर लिया. तो, आइए आज जानते हैं इसके पीछे की कहानी.

इतिहास के पन्नों को खंगालने पर हम बंगाल में हुए ‘प्लासी का युद्ध’ के बारे में बात करते हैं. जिसे पढ़ने के बाद हर इंसान भारतीय चापलूसों के बारे में जान जाएगा कि कैसे चापलूसों ने अपने स्वार्थ के लिए देश को अंग्रेजों के हाथ में सौंप दिया.

ये कहानी है सन् 1700 के आस-पास की. जब अंग्रेज यहां पर व्यापार करने के लिए यहां आए. ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हो चुकी थी. लगभग 150 से अधिक वर्षों तक व्यापार करने के बाद अब उनका इरादा भारत के प्रति शासनात्मक हो चूका था.

बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला, फाइल फोटो

अप्रैल सन् 1756 ई० में बंगाल प्रांत के नवाब के रूप में मिर्जा मुहम्मद सिराज उद – दावला ने बागडोर संभाली. मुग़लों के बनाए हुए प्रांत में पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उड़ीसा तथा बांग्लादेश सम्मिलित था. यह वह दौर था जो ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का शुरुआत माना जाता है. सिराजुद्दौला के शासन से ही अंग्रेजों ने मान लिया था कि अब भारत पर शासन करना आसान है. हालांकि सिराजुद्दौला एक देशभक्त था लेकिन कुछ जयचंदों के वजह से उसे अपनी जान गंवानी पड़ी.

आइए जानते हैं इसकी पूरी कहानी-

भारत में बंगाल अंग्रेजों के हाथ में आने वाला पहला राज्य था. मुग़ल काल में बंगाल सबसे उपजाऊ और सबसे अमीर प्रांत था. इस प्रांत की अधिकारिक शक्तियां बंगाल के नवाब के हाथों में थी. अलीवर्दी खां की मृत्यु के बाद 23 जून 1956 को सिराजुद्दौला मिर्जा मुहम्मद सिराज उद – दावला ने बंगाल के नवाब के पद पर कार्यभार संभाला. सिराजुद्दौला अपने ही दरबार में कई प्रतिद्वंदियों से घिरा था. जिन्होंने बाद में अंग्रेजों से हाथ मिलाकर अपने ही देश को बर्बाद करने का बीड़ा उठाया.

रिश्वत से खरीदे गए बंगाल के कई जनरल

अंग्रेजों की बंगाल के नवाब के हाथों से बुरी हार के बाद मद्रास से रोबर्ट क्लाईव के नेतृत्व में एक मजबूत बल बंगाल में नवाब को उखाड़ फेंकने और ब्रिटिश शासन को मजबूत करने के लिए भेजा गया. रोबर्ट क्लाइव को नवाब के दरबार में रिश्वतखोर और लालची लोगों की तलाश थी. जिसकी कमी को मीर जाफर जैसे जयचंदों ने पूरा किया. क्लाइव ने सिराजुद्दौला के रिश्तेदार मीर जाफर और अन्य बंगाली जनरलों को रिश्वत देकर खरीद लिया था. अंग्रेजों ने मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बनाने का वादा किया. जिसके बाद मीर जाफ़र ने अंग्रेजों का पूर्ण समर्थन करने का वादा किया.

मीर जाफ़र, फाइल फोटो

एक तिहाई सेना ने युद्ध ही नहीं लड़ा

नवाब के पास 50,000 सैनिक थे, जबकि उसकी तुलना में रोबर्ट क्लाइव के पास मात्र 3000 सैनिक थे. हालांकि षड़यंत्रकारियों के साथ अंग्रेजों के गुप्त गठबंधन ने युद्ध में ब्रिटिश सेना को मजबूत किया. मीर जाफ़र एक तिहाई सेना के साथ लड़ाई में शामिल ही नहीं हुआ. जो कि बंगाल के नवाब की हार के प्रमुख कारणों में से एक था. मजबूर परिस्थितियों में नवाब ने सेना समेत भागने की कोशिश की, लेकिन मीर जाफर के बेटे मीरन ने उसे मार डाला. अंग्रेजों के युद्ध जीतने के बाद मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब तो बनाया गया. लेकिन एक-एक करके उससे उसके सारे अधिकार छीन लिए गए. बाद में अंग्रेजों ने बंगाल के नवाब के पद पर मीर जाफ़र के दामाद मीर कासिम को बैठा दिया.

प्रभाव  

यह युद्ध भारत में अंग्रेजों के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ. क्योंकि इसके बाद बंगाल में पूर्णत: अंग्रेजी शासन की स्थापना तो गई. साथ ही अंग्रेजों को यह भी समझ आ गया कि भारतीय राजाओं और नवाबों के यहां के लोगों को लालच देकर बड़े आसानी से उनसे अपना काम कराया जा सकता है.

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