मजहब को भारत के बंटवारे का इनाम है ‘वक्फ बोर्ड’

भारत का बंटवारा मजहब के आधार पर हुआ. जिन्हें भारत मे रहना नागवार गुजर रहा था. वो अपने मजहब के साथ

जिन्ना के नेतृत्व में अपना हिस्सा लेकर पाकिस्तान चले गए और बदले में उनकी जमीन-जायदाद यहीं रह गई.

बस यहीं से वक्फ बोर्ड (Central waqf council) के कॉन्सेप्ट का उदय हुआ. जिस सरकार को उस सम्पत्ति को भारत सरकार की कर देनी चाहिए थी (उदाहरण के लिए पाकिस्तान सरकार ने वहां के हिंदुओं-सिखों-बौद्धों की जमीन को सरकार की बना दी या स्थानीय मुसलमानों ने कब्जा ली). उसने पुनः उस जमीन को भारत मे ही उसी मजहब के नाम पर कर दिया. जिसका भारत मे रहने में दम घुट रहा था.

इतना ही नहीं हमारी सरकार बहादुरों ने तुष्टिकरण व अन्याय की सारी पराकाष्ठा पार करते हुए उस असंवैधानिक क्रिया कलाप को संवैधानिक अमली जामा भी पहना दिया. जिसके दावे पर अब सामान्य नागरिक हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती नहीं दे सकती. उसका अपना एक समानान्तर कोर्ट चलता है.

मतलब मजहब के दोनों हाथ मे लड्डू

मतलब बटवारे में मुसलमानों को एक नया देश पाकिस्तान मिला और दूजा भारत मे भी वक्फ बोर्ड के रूप में उनकी सम्पत्ति को उनके मजहब के लिए सुरक्षित कर दी गई.

न कि सरकार ने उसका अधिग्रहण सरकारी संपत्ति के रूप में किया (शत्रु संपत्ति अपवाद है).

अभी बात खत्म नहीं हुई है. क्योंकि मजे की बात यह है कि जिन्हें जाना था, वो 1947 में ही चले गए, लेकिन वक्फ की संपत्ति में लगातार इजाफा हो रहा है.

मतलब अभी लोग भारत से पाकिस्तान नहीं जा रहे, लेकिन वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति फिर भी बढ़ती ही जा रही है. कोई भी सड़क का फुटपाथ, रेल की पटरी और जंगल. कब एक छोटी सी मजार से वक्फ की संपत्ति में बदल जाये. कहा नहीं जा सकता. खुला खेल चल रहा है. यह सब भारत मे.

(2009 में वक्फ के पास लगभग 4 लाख एकड़ जमीन थी, लेकिन मौजूदा वक्त में यह दोगुना बढ़कर 8 लाख एकड़ से ज्यादा जमीन पर फैली हैं)