वामपंथी पत्रकार रविश कुमार को द फ्रंट फेस इंडिया न्यूज़ पोर्टल दे रहा इक्कीस तोपों की सलामी, जानिए वजह

पेट्रोल से कुल्ला करने वाले धरती के महामानव पत्रकार की आजकल चुप हैं. चमड़े के जुबान से से हवा ही तो निकालनी है. लेकिन शायद बढ़ती गर्मी के प्रकोप के कारण चमड़े की जुबान सूख गई है. या फिर वहां पर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की भारी कमी पड़ गई है. जब भी कभी हिंदुओं के पक्ष में कोई बात लिखनी हो, रवीश कुमार जैसे पत्रकारों की उंगलियां थरथर कांपने लगती हैं. रवीश कुमार ने 13 मई को यानी ज्ञानवापी सर्वे से पहले अपने ऑफिशियल फेसबुक पेज पर सर्वे को लेकर पोस्ट किया. जिसमें उन्होंने लगभग 850 शब्दों में ज्ञानवापी मंदिर सर्वे को लेकर हिंदुओं और याचिकाकर्ताओं को दोषी ठहराया.
रवीश के हिसाब से खुदाई करना बहुत ही गलत है रवीश ने लंबे चौड़े पोस्ट में हिंदुओं को दोषी ठहरा तो दिया. लेकिन इसी लंबे चौड़े पोस्ट में एक लाइन उन्होंने ऐसा भी लिख दिया, जिससे उनका इस्लाम और वामपंथी प्रेम स्पष्ट तौर पर दिखाई देने लगा. रवीश ने लिखा है, “इस देश में जब किसी की भी ज़मीन पर कब्ज़ा हो सकता है, किसी के घर को ढहा दिया जा सकता है तो ऐतिहासिक इमारतों के साथ भी हो सकता है. बहुत दूर की बात नहीं है जब एक इमारत को ढहा दिया गया था. ऐतिहासिक इमारतों को खोद कर देखने वाले, उनकी ईंटें खिसका कर देखने वाले काफी सभ्य हैं. गनीमत है कि ये लोग उस इमारत को ढहाने के लिए जमा नहीं हुए हैं.वर्ना तो इनका सारा अनुभव ढहाने का ही है. खोदने का अनुभव तो है ही नहीं. एक मुद्दे को लेकर पचीस साल काट देने वाले लोग अब पांच मिनट में उस तरह के पचासों मुद्दे पैदा कर डालते हैं और गोदी मीडिया के ज़रिए घर-घर पहुंचा देते हैं. उन्हें दावा करने और हंगामा करने से कोई नहीं रोक सकता है.
ऐसे लोगों को पता है कि जब ज़मीन के नीचे से कोयला,हीरा, तांबा, लोहा, यूरेनियम जैसे पदार्थ निकाले जा सकते हैं तो ऐतिहासिक इमारतों की खुदाई से भी कुछ न कुछ निकलेगा. इन्हें मालूम है कि खुदाई से ही इतिहास के अवशेष निकलते हैं. शिलालेख और भग्नावशेष निकलते हैं.अस्थियां और बस्तियां निकलती हैं. जब पहले निकला है तो अब क्यों नहीं निकलेगा? इसलिए, इस काम के लिए नए-नए संगठन हर दिन निकल कर सामने आ रहे हैं. ऐसे लोग कहां से निकल आते हैं, यह सवाल उसी तरह बेतुका है कि कोयला कहां से निकल आता है.खदान काफी बड़ा है और ऐसे हीरों की कमी नहीं है.”

रवीश कुमार ने कितनी बेशर्मी से इतनी सारी बातें लिखी हैं. जबकि मुगल आक्रांताओं का हिंदू मंदिरों पर आक्रमण किसी से छुपा नहीं है. बात यहां ज्ञानवापी मंदिर की हो रही है. ‘ज्ञानवापी’ जोकि संस्कृत से लिया गया शब्द है और संस्कृत हिंदुओं की प्राचीन भाषा है. रवीश कुमार ने बिना कुछ जाने सुने इतना बड़ा प्रखंड किया. ऐसे महान क्रांतिकारी पत्रकार को द फ्रंट फेस इंडिया इक्कीस तोपों की सलामी देता है. जोकि हिंदुओं के इतिहास को दबाकर इस्लाम की मार्मिक गाथा को लोगों के सामने दुखड़ा गाकर सुनाते हैं. रवीश कुमार को यह नहीं पता कि खुदाई भी जरूरी है. यदि खुदाई जरूरी ना होती तो शायद हमें सिंधु घाटी सभ्यता और मोहनजोदड़ो सभ्यता के बारे में पता नहीं चलता. किताबों में जिन मुगलों के स्थापत्य कला और तमाम नमूनों को बच्चों को पढ़ाया जाता है. उनमें अधिकतर अवशेषों के जरिए ही पता चलते हैं.
रवीश कुमार के अनुसार, सभी न्यूज़ चैनल व अखबार वर्तमान में गोदी मीडिया के रूप में कार्यरत हैं. केवल वे ही एक ऐसे पत्रकार हैं जोकि सच्चे हैं. ये कहीं से भी बिके नहीं हुए हैं. यह बात अलग है कि रवीश कुमार की तस्वीरें आए दिन अखिलेश यादव सुश्री मायावती भाजपा स्टार प्रचारक राहुल गांधी के साथ वायरल होती रहती हैं. लेकिन इतना होने के बावजूद वे अब तक बिके नहीं हैं. ज्ञानवापी मस्जिद में शिवलिंग मिलने के बाद से उस पर इन्होंने एक पोस्ट तक नहीं लिखा है इसके लिए द फ्रंट ऑफ इंडिया की ओर से इन्हें इक्कीस तोपों की सलामी दी जाती है.