पंजाब में मॉब लिंचिंग पर राहुल गांधी ने भाजपा पर उठाए सवाल, भूले अपना रक्त रंजित इतिहास

जिनके स्वयं के इतिहास की किताब मॉब लिंचिंग में मारे गए व्यक्तियों के खाल के जिल्द से बनी हो, जिस किताब का एक-एक अक्षर पेन की नीब में स्याही के बदले मानवीय रक्त भरकर लिखा गया हो, जिनके इतिहास के हर एक पन्ने से मॉब लिंचिंग की सड़ान्ध्र आ रही हो, ऐसे लोगों को याद दिला दें कि गोरक्षा कानून की मांग कर रहे करपात्री जी महाराज सहित कई साधुओं की हत्या हो या फिर पालघर में वेल प्लांड मॉब लिंचिंग के तहत साधुओं की हत्या. ये साडी घटनाएं अगर इन्हें याद नहीं हैं, तो ये इतिहास की कक्षा के बैक बेन्चर हैं. लोकतंत्र में जनता की याददाश्त कमजोर होती है, इसलिए ये लोग जनता को आसानी से बरगला जाते हैं. किसी भी राजनैतिक घटना का आकलन उस पार्टी विशेष के कम से कम पिछले 30 साल के रिकॉर्ड व् चरित्र के आधार पर किया जाना चाहिए.

हिंदी में एक कहावत है ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे.’ जिसका अर्थ ‘खुद गलती करके दूसरों को डांटना’ होता है. यह कहावत चरितार्थ हो रहा है, कांग्रेस के कद्दावर नेता व सांसद राहुल गांधी पर. राहुल ने अपने मंगलवार को अपने ऑफिसियल ट्विटर अकाउंट से मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए लिखा, 2014 से पहले ‘लिंचिंग’ (Mob Lynching) शब्द सुनने में नहीं आता था. आइए आज राहुल गांधी को जरा इतिहास का बोध कराते हैं. जिस कांग्रेस के हाथ 1984 के सिख नरसंहार से रँगें हों, उनके मुंह से ऐसी बातें शोभा नहीं देती. क्योंकि इनकी भाषा में इसे ‘बड़े पेड़ गिरने के बाद धरती का हिलना’ कहते हैं.

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर और कपूरथला के गुरूद्वारे में दो युवकों की मॉब लीचिंग के बाद ये शब्द एक बार फिर से चर्चा में आ गया है. इतने के बावजूद राहुल गांधी इसके लिए भाजपा को दोषी मान रहे हैं. जबकि पंजाब में इनकी (कांग्रेस की) ही सरकार है. नेताओं ने बेअदबी की ही निंदा की है. किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि हत्या की निंदा कर सके. प्रशासन इनका, सरकार इनकी, इसके बावजूद ये ‘मॉब लिंचिंग’ की तुलना 2014 के पहले और 2014 के बाद से कर रहे.

कांग्रेसी और उनके समर्थक तब तक चुप रहते हैं. जब तक किसी हिन्दू की हत्या या हिन्दू को बदनाम करने का इन्हें एजेंडा न मिल जाय. इससे पहले भी झारखंड में चोर तबरेज आलम, उत्तर प्रदेश में मोहम्मद अख़लाक और राजस्थान में पहलू खान की हत्या को हिदुओं को बदनाम करने के लिए सांप्रदायिक मोड़ दिया गया. लेकिन वहीँ नालंदा में शुभम पोद्दार, कासगंज में चन्दन गुप्ता और दिल्ली दंगों में अंकित शर्मा की हत्या इनके लिए ‘मॉब लिंचिंग’ की श्रेणी में नहीं आती.

राहुल गांधी की याददाश्त शायद कमजोर हो गई है या फिर वे जान बूझकर भूलने की नौटंकी कर रहे. उन्हें कांग्रेस की सरकार के तमाम ‘मॉब लिंचिग’ याद ही नहीं. राहुल गांधी से निवेदन है कि वे जरा इतिहास पढ़ लें. क्योंकि जवान तो वे 33 वर्ष पहले ही हो चुके हैं. जरा अपने पुरखों द्वारा की गई मॉब लिंचिंग’ को भी ये याद कर लें जब 1947 में देश की आजादी के समय लाखों हिन्दुओं को भारत – पाकिस्तान विभाजन के लिए मार डाला गया था. सत्ता की चाह में गांधी खानदान ने हिन्दुओं को मरने के लिए छोड़ दिया था. ‘खिलाफत आंदोलन’ को इनकी ही पार्टी ने समर्थन दिया था और उस समय केरल में ‘मोपला नरसंहार’ में सैकड़ों हिन्दुओं की बलि दे दी गई थी. ये सब बातें राहुल गांधी को याद दिलाना हमारा फर्ज बनता है. वैसे भी बंगाल और केरल में हिन्दुओं का कत्लेआम बहुत ही आम बात है. लेकिन इन ‘मॉब लिंचिग’ पर कुछ लिखने में श्री मान् गांधी जी के जज्बात बदल जाते हैं, कलम सूख जाती है और हाथ रूक जाते हैं.

हाल ही में पश्चिम बंगाल में TMC की जीत के बाद पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा में चुन-चुन कर बीजेपी कार्यकर्ता मारे गए थे. और तो और इस हिंसा में कांग्रेस के भी कई कार्यकर्ता मारे गए थे. लेकिन राहुल गांधी के अनुसार, ये सब ‘मॉब लिंचिंग’ के श्रेणी में नही आते.

कांग्रेस के इतिहास को खंगालें तो ढेरों ऐसी घटनाएं मिलेंगी जो इनके चरित्र को जनता के सामने लाकर रखने में सक्षम हैं. आज से ठीक 56 साल पहले इंदिरा गांधी की सरकार ने गौहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने के लिए लोकतांत्रिक तरीके से मांग कर रहे हजारों साधुओं पर गोलीयां चलवाईं थी. दमन के वह सब पैतरे अपनाए, जो ब्रिटिश अपनी विरासत में गांधी परिवार के पास छोड़ गए थे. उस समय साधु – संतों पर इतनी गोलियां चली थी कि दिल्ली में कर्फ्यू तक लगाना पड़ गया था. तब गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा थे, जिन्होंने मामले से क्षुब्ध होकर इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने खुद को इसके लिए जिम्मेदार बताया था.

कहा जाता है कि संत शिरोमणि करपात्री महाराज ने तब इंदिरा को शाप दे दिया था कि जैसे उन्होंने साधुओं पर फायरिंग कराई है, ठीक ऐसा ही उनका भी हाल होगा. यह शाप उन्होंने संसद भवन के बाहर संतों-साधुओं की लाशें उठाते हुए दिया था. वह इस घटना के बाद अवसाद में चले गए थे. गोरखपुर से छपने वाली मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ में इस घटना के बारे में छपा था. पत्र‍िका में करपात्री महाराज के हवाले से इंदिरा गांधी के लिए छपा था, “मुझे” इस बात का दुख नहीं कि तूने निर्दोष साधुओं की हत्या कराई, बल्कि तूने गोहत्या करने वालों को छूट देकर पाप किया है. यह माफी के लायक नहीं है. गोपाष्टमी के दिन ही तेरे वंश का नाश होगा.”

कांग्रेस के लिए सिखों की जान का कोई महत्व शुरू से ही नहीं रहा है. क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी के नाम इनमें सामने आए थे. जिसके बा राजीव गांधी ने कहा था, “जब बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती है.” आज भी सज्जन कुमार (उस समय के कांग्रेस के बड़े नेता) इस मामले में जेल में हैं. दिल्ली में जगदीश टाइटलर हों, या एमपी के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ऐसा कोई नेता नहीं जिद्प्र हिन्दुओं की हत्या के आरोप न लगे हों. उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी और 1980 बैच के आईपीएस अधिकारी सुलखान सिंह ने 1984 के सिख दंगे को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के इशारे पर सिखों के ख़िलाफ़ किया गया नरसंहार बताया था. उन्होंने लिखा था कि राजीव गाँधी के मुख्य विश्वासपात्र कमलनाथ इस पूरे नरसंहार की मॉनीटरिंग कर रहे थे.

हिन्दू नरसंहार पर राजीव गांधी का बयान, साभार- ऑपइंडिया

दरअसल, ये सब बातें पहले पहले इसलिए भी सुनने में नहीं आती होंगी, क्योंकि तब सोशल मीडिया का जमाना नहीं था. सरकारी टेलीविजन पर देश-दुनिया वही सुनती-देखती थी, जो कॉन्ग्रेस चाहती थी. अभी भी नैरेटिव बनाने वाला पूरा का पूरा गिरोह कॉन्ग्रेस के हाथों में खेलता है, जिसमें ‘खान मार्किट’ का पत्रकार से लेकर लिबरल-सेक्युलर गिरोह के कथित एक्टिविस्ट्स शामिल हैं. अब सोशल मीडिया पर आम लोग आवाज़ उठा सकते हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस को बेचैनी हो रही है. राहुल गाँधी को देश का इतिहास नहीं, सिर्फ अपनी पार्टी कॉन्ग्रेस का ही इतिहास पढ़ लेने की ज़रूरत है, ताकि उन्हें पता चल जाए कि ‘लिंचिंग’ क्या होता है. पार्टी भी छोड़ दीजिए, वो अपने परिवार का ही इतिहास पढ़ लें कम से कम. असल में 2014 से पहले ऐसी ज्यादा ही घटनाएँ सामने आती थीं, लेकिन उसे एक खास नैरेटिव का अंग नहीं बनाया गया और तब का विपक्ष हिन्दुओं को बदनाम करने वाला नहीं था, इसीलिए इसे लेकर ज्यादा हंगामा नहीं हुआ.

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