BBC पर छाया हिन्दू विरोध, दीपावली और पटाखों पर लिखी ये बात

बीबीसी और अन्य हिंदू विरोधी दलों को हिंदुओं के त्यौहार पर प्रश्न चिन्ह उठाने की आदत पड़ चुकी है. इस बार भी इन्होंने हिंदुओं के त्यौहार दीपावली को लेकर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है. बीबीसी (BBC) में 23 अक्टूबर को एक लेख प्रकाशित किया गया. जिसमें दीपावली के पटाखे और उनसे हो रहे प्रदूषण को दर्शाया गया. इससे पूर्व एक लाइन में राम लक्ष्मण और सीता के वनवास काल का भी जिक्र किया गया. लेकिन इस दौरान आर्टिकल लिखने वाली लेखिका ने लिखा है, दण्डकारण्य के जंगलों में रात हो गई. पौराणिक रामायण के मुताबिक, इस जंगल में 14 साल के वनवास के दौरान राम सीता और लक्ष्मण रहे थे.”

सर्वप्रथम यह बात सभी जानते हैं कि रामायण कोई पौराणिक कथा नहीं है. बल्कि यह हमारा इतिहास है. वह बात अलग है कि वामपंथी आज भी रामायण और उसके इतिहास को लेकर सवाल उठाते हैं. माना कि यह लेख लेखिका का व्यक्तिगत है. लेकिन जो भी लोग मीडिया की थोड़ी बहुत नॉलेज रखते हैं, उन्हें पता है कि प्रूफ रीडिंग और एडिटिंग वगैरह के बाद लेखक/लेखिका द्वारा लिखा लेख चैनल और उसके मालिक का हो जाता है. फिर वह लेखिका या लेखक का नहीं रह जाता. मालिक की विचारधारा के अनुसार लेख को प्रकाशित किया जाता है.

इस आर्टिकल में पटाखों से हो रहे प्रदूषण पर सवाल उठाया गया. जिसमें आग्रह किया गया कि ज्यादा से ज्यादा लोग शोर मुक्त रचनात्मक और बेहतर दिवाली मनाएं. लेखिका ने लिखा, “इस साल मैं, आस-पास दिवाली के महौल पर लिख रही हूं. अब मैं मेट्रो सिटी में रहने वाली एक मां हूं. बच्चों के स्कूलों में उन्हें बताया गया है कि पहले से प्रदूषित वातावरण में दिवाली के मौक़े पर शोर और प्रदूषण को बढ़ाना नहीं है. कजिन्स के बीच सुंदर और आकर्षक पटाखों के इस्तेमाल की होड़ भी है जो अनार, चरखी और रॉकेट जैसी कम आवाज़ करते हैं.

मेरी मां और बड़ी बेटी, दोनों लंबे समय से अस्थमा से पीड़ित हैं, हर साल दिल्ली की दिवाली के दौरान उनकी मुश्किल बढ़ जाती है. इस साल सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों की बिक्री पर रोक लगाई है लेकिन सोशल मीडिया पर इस फ़ैसले को हिंदू संस्कृति पर हमला बताते हुए आलोचना की जा रही है.

अपने परिवार वालों और ख़ुद के लिए ज़्यादा से ज़्यादा लोग शोर मुक्त, रचनात्मक और बेहतर दिवाली बनाएं, मैं तो ये चाहती हूं. इसके लिए हमें महंगे उपहारों के लेन देन से भी बचने की ज़रूरत है. हमें पटाखे और जंक फूड हैंपरों पर ख़र्च करने से बचना होगा, हमें ये पैसा किसी अच्छे काम के लिए दान दे देना चाहिए. हम में से कईयों के लिए पटाखों के प्रदूषण के चलते शहर से दूर और फिर से जंगलों की सुरक्षा घेरे में जाने की ज़रूरत हो सकती है.

बीबीसी ने यह लेख 23 अक्टूबर 2022 को प्रकाशित किया है.

अब सवाल ये उठता है कि आखिर यह लोग कौन हैं? जिन्हें हरदम सवाल उठाने के लिए हिंदू त्यौहार ही मिलते हैं. इन्हें 31 दिसंबर और फर्स्ट जनवरी की रात डीजे की धुन और शोर-शराबे से दिक्कत नहीं होती. इन्हें बकरीद पर कट रहे जानवरों के दर्द से पीड़ा नहीं होती. जानवरों के अवशेष जो सड़कों पर खुलेआम सड़ने के लिए छोड़ जाते हैं. उसके बाद वह महीनों पड़े रहते हैं और वातावरण को महीनों तक प्रदूषित करते हैं. उससे इन वामपंथियों को कोई समस्या नहीं होती. इन्हें बस होली पर पानी की बर्बादी, दीपावली पर पटाखे और दुर्गा पूजा में जुट रही भीड़ समस्याएं होती हैं. आवश्यकता है, भीड़ में ऐसे लोगों को पहचानने की. जो कि हिंदू विरोध में धृतराष्ट्र बन जाते हैं. जिन्हें अच्छे बुरे की समझ नहीं है. केवल इन्हें हिंदू और हिंदू त्योहारों का विरोध करना है.