‘अयोध्या तो बस झांकी है, काशी-मथुरा अभी बाकी है’ 1947 में तीन दोस्तों ने मंदिर वापसी आन्दोलन का खींच दिया था खाका

1947 के शुरूआती दिनों में महाराजा सिंह ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया. केरल के रहने वाले नायर, उस समय सरयू के उस पार फैजाबाद से सटे गोंडा जिले में तैनात थे. इसी यज्ञ में महाराजा के गुरू करपात्री महाराज भी शामिल हुए.

अयोध्या में श्री राम मंदिर स्थापना के बाद से ही नारा बुलंद हो गया था, ‘अयोध्या तो अभी झांकी है. काशी मथुरा बाकी है.’ जिसके बाद काशी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भव्य विश्वनाथ कॉरीडोर का उद्घाटन किया. जिसके बाद विश्वनाथ कॉरीडोर की गूंज विश्व भर में गूंज रही है. काशी का नाम विश्वपटल पर ऊँचा हो रहा है. लेकिन आपको बता दें मंदिरों के लिए दिया हुआ नारा बहुत बाद में बुलंद हुआ. इससे पहले कई हिन्दू आंदोलनकारियों ने मंदिरों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए थे. राम जन्मभूमि इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. जब पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों को गोलियों से भुनवा दिया था.

अब अयोध्या और काशी के बाद मथुरा को आजाद कराने की मांग उठ रही है. जिसके लिए श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट का गठन किया गया है. इस ट्रस्ट से 14 राज्यों के 80 संत महामंडलेश्वर जुड़े हैं. इस आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए हस्ताक्षर अभियान शुरू करने की योजना बनाई गई है.

टेनिस से हुआ था तीनों का मिलाप

दरअसल, हिन्दुओं की मंदिर वापसी का यह आंदोलन एक खेल से जुड़ा हुआ है. यह खेल 12वीं सदी में उत्तरी फ्रांस से शुरू हुआ जिसका नाम ‘जिउ दी पौमे’ जिसे हिंदी में ‘हथेली का खेल’ कहा जाता है, इंग्लैंड पहुंचते ही इसका नाम बदलकर ‘टेनिस’ कर दिया गया. इस खेल को अंग्रेज सन् 1880 में हिंदुस्तान लेकर आए थे. 1920 के दौरान भारत ने   डेविस कप में भाग लेना भी शुरू कर दिया था. हालांकि भारतीय लॉन टेनिस का इतिहास भले 100 साल से पुराना हो. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छाप छोड़ने वाले हम चुनिंदा खिलाड़ी ही पैदा कर पाए हैं.

करपात्री महाराज भी हुए शामिल

इस खेल ने हिन्दू जीवन दर्शन के तीन पैरोकारों को इतनी मजबूती से जोड़ा कि इसने आजाद भारत में अयोध्या में राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन की नींव डाल दी. आजाद भारत में तीन दोस्तों (बलरामपुर स्टेट के महाराजा पटेश्वरी प्रसाद सिंह, नाथपंथी कनफटा साधुओं की शीर्ष पीठ गोरक्षपीठ के महंत दिग्विजय नाथ और आईसीएस अधिकारी केकेके नायर. महाराजा सिंह घुड़सवारी और लॉन टेनिस में पारंगत थे तो वहीँ महंत नाथ लॉन टेनिस और नायर की भी इस खेल में बहुत रुचि थी. तीनों लोगों का हिन्दू धर्म के प्रति अत्यधिक लगाव था. साथ ही तीनों की दोस्ती का आधार लॉन टेनिस ही था. वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा की किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ के अनुसार, 1947 के शुरूआती दिनों में महाराजा सिंह ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया. केरल के रहने वाले नायर, उस समय सरयू के उस पार फैजाबाद से सटे गोंडा जिले में तैनात थे. इसी यज्ञ में महाराजा के गुरू करपात्री महाराज भी शामिल हुए.

हिन्दू धर्मस्थलों की मुक्ति का प्रण

हेमंत शर्मा के अनुसार, स्वामी करपात्री ने ही उन्हें बताया था कि राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की नींव उसी यज्ञ में पड़ी थी. नायर की मौजूदगी पहले से ही वहां पर थी, यज्ञ समाप्ति से के दिन पहले दिग्विजय सिंह भी वहां पहुंच गए. उस यज्ञ में उन हिन्दू धर्मस्थलों की मुक्ति पर चर्चा हुई जिसे इस्लामी आक्रान्ताओं ने कब्ज़ा कर लिया था या फिर उन्हें गिराकर उनपर मस्जिद बना लिए थे.

स्वामी करपात्री महाराज ने अयोध्या के साथ ही काशी और मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि को दोबारा हासिल करने का खाका पेश किया. आईसीएस अधिकारी नायर ने वादा किया कि इस आंदोलन के लिए वे अपनी नौकरी समेत अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हैं.

अंतिम यात्रा में ‘राम नाम …’ की जगह ‘राम जन्मभूमि के उद्धारक अमर रहे’

यह एक संयोग ही था कि 1 जून 1949 को केकेके नायर फ़ैजाबाद के कलेक्टर बने. वहीँ पहले से ही सिटी के मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह और अभिराम दास राम जन्मभूमि मुक्ति के लिए प्रयासरत थे. हिन्दू महासभा से जुड़े होने के कारण अभिराम दास महंत के बड़े करीबी थे. उनकी ख्याति राम जन्मभूमि के ‘उद्धारक’ के तौर पर जानी जाती है. कहा जाता है कि अभिराम दास की अंतिम यात्रा में भी ‘राम नाम…’ की जगह ‘राम जन्मभूमि के उद्धारक अमर रहे’ की गूंज हर ओर से आ रही थी.

नायर के फ़ैजाबाद में तैनाती के कुछ महीने बाद ही 22-23 दिसंबर 1949 की रात रामलला अपने भाइयों के साथ विवादित गुम्बद के भीतर प्रकट हुए. नायर ने उस समय तत्कालीन प्रधानमत्री पंडित नेहरु के दबाव पर भी मूर्तियों को हटाने से इंकार कर दिया. 1952 में फैजाबाद से अन्यत्र तबादला होने पर उन्होंने नौकरी ही छोड़ दी.

2 thoughts on “‘अयोध्या तो बस झांकी है, काशी-मथुरा अभी बाकी है’ 1947 में तीन दोस्तों ने मंदिर वापसी आन्दोलन का खींच दिया था खाका

Leave a Reply

Your email address will not be published.