क्या स्वदेशी इंडियन इलेक्ट्रिक स्कूटर स्टार्टअप्स को बदनाम करने की हो रही है साजिश?

विदेशी कंपनियों के दलालों द्वारा स्वदेसी इलेक्ट्रिक स्कूटरों में आग लगने की घटनाओं को इस तरह प्रेसित किया जा रहा है, जैसे भारत में स्कूटर बनते ही आग लगने के लिए हैं.

जबकि यहीं भारत मे दशकों से लिथियम आयन बैटरी पैक वाले ई-रिक्शे चल रहे हैं, शायद ही कभी ऐसी घटना देखी गई हो.

तो फिर क्या कारण हो सकता है कि केवल स्वदेसी स्टार्टअप को निशाने पर लिया जा रहा है, जबकि दुनिया भर में यही सेल तकनीक सक्सेज है??

मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस गर्मी में आग लगने की घटना इलेक्ट्रिक स्कूटरों के मुकाबले पेट्रोल से चलने वाली बाइक्स में ज्यादा हुई है.

बस अंतर यह है कि ऐसी घटनाएं प्रमुखता से सामने नहीं लाई गई हैं.

हां इलेक्ट्रिक स्कूटर में आग लगने की अब तक 5 घटना सामने आ चुकी है, इससे इनकार नहीं है. लेकिन यह संख्या सालभर में बेचे जाने वाले ई-स्कूटरों की संख्या का 1 प्रतिशत भी नहीं है.

इसकी वजह भी उनकी बनावट या तकनीकी नहीं है, बल्कि इन दिनों तापमान का तेजी से बढ़ना है और लम्बी राइड के बाद स्कूटर को यूं ही धूप में खड़ा कर दिया जाना है.

वास्तव में जब गाड़ी धूप में खड़ी रहती है तब उसकी बॉडी का टम्परेचर 70 डिग्री या उससे भी ज्यादा हो जाता है.

सीट के नीचे का हिस्सा एयर टाइट होता है ऐसे में उसका टेम्परेचर भी उतना हो जाता है. जब हम गाड़ी को स्टार्ट करते हैं तो उसे आगे बढ़ाने के लिए मोटर का ज्यादा पावर लगता है.

इससे तापमान और भी ज्यादा बढ़ जाता है. इसी वजह से गाड़ी में स्मैल आने लगती है और कई बार गर्मी की वजह से बैटरी में आग लग जाती है.

देखा जाय तो यह एक समस्या है,जिसे मात्र केवल थर्मल अलार्म के माध्यम से रोका जा सकता है और कूलिंग सिस्टम के बीच संतुलन वाला सॉफ्टवेयर गाड़ी को और भी प्रोटेक्ट कर सकता है. हाल ही में टाटा मोटर्स ने इसके संसोधित वर्जन का इस्तेमाल अपनी सीएनजी कारों में किया है.

वास्तव में थर्मल अलार्म एक प्रोटेक्टर की तरह कार्य करता है और हीट बढ़ने पर पॉवर सप्लाई को बाधित कर देता है. जो गाड़ी को आग लगने से बचा लेता है.

लिहाजा भारतीय निर्माताओं को केवल इन दोनों तकनिकी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और सम्भव हो तो बैटरी सेल पर चीन पर निर्भरता की बजाय खुद की तकनीक तैयार करनी चाहिए.

फिर देखो. सूरत क्या होती है.

रही बात कंपनियों को बदनाम करने से किसका फायदा होगा. तो यह समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है.

वर्तमान में भारत मे ईवी सेगमेंट अपने प्राथमिक अवस्था मे है और इन दिनों ट्रिपल व फोर्थ डिजिट में ग्रोथ दर्ज कर रही हैं. कई घरेलू व विदेशी कम्पनियां इस सेगमेंट में एंट्री के लिए करोड़ो अरबों का निवेश कर रही हैं.

यानि यहां सम्भावनाओं का अपार रास्ता देसी-विदेशी हर एक निर्माता के लिए खुला हुआ है और स्पेस एक तरह से अभी पूरी तरह से खुला हुआ है.

लेकिन जब उनकी राह में नए नए स्टार्टअप खड़े हो जाएंगे तो उन्हें बदनाम करने के लिए इस तरह के हथकंडों से इनकार नहीं है.

इसलिए आपसे मेरा केवल इतना निवेदन है कि आपको जो वाहन खरीदना है, खरीदें. उससे मुझे प्रॉब्लम नहीं है. बस बड़ी मछलियों के ट्रैप में फंसकर इंडियन स्टार्टअप की हत्या न करें.

उन्हें कोई कम्पनी स्थापित करने या प्रोडक्ट तैयार करने में काफी मेहनत लगती है. कोई एक प्रोडक्ट उतारने के पहले उसे 156 बार रोड टेस्ट के दौर से गुजरना होता है. मार्केटिंग, मीडिया, ब्रांडिंग तक इतने पापड़ बेलने पड़ते हैं कि कोई आम आदमी हो तो वह यूँ ही छोड़कर भाग सकता है.

पर इसके बावजूद भी ये स्टार्टअप बड़ी कम्पनियों की आंखों में आंखें डालकर खड़े हैं और उनसे बेहतर प्रोडक्ट व सर्विस दे रहे हैं या देने का प्रयास कर रहे हैं.

इन दिनों भारत के भविष्य के लिए ओला, आइवुमी, एथर एनर्जी, सिंपल एनर्जी, ओकिनावा, ओबेन इलेक्ट्रिक, रिवोल्ट, टार्क मोटर्स, प्योर ईवी जैसे धाकड़ इंडियन स्टार्टअप और उनके युवा मालिकों व उनके टीम की मेहनत काबिले गौर है.

इनके बारे में कुछ भी नकारात्मक लिखने से पहले एक बार क्रॉस चेक अवश्य करें- धन्यवाद

दीपक पाण्डेय