कट्टर इस्लामी टीम के पुराने बल्लेबाज हैं ‘कबीर खान’ आपने कभी नोटिस किया क्या? ‘83’ में भी इनकी फ़ौज शामिल

80-90 के दशक में बॉलीवुड ने हिन्दुओं को भ्रमित करने का जिम्मा उठा लिया था. जब ‘शोले’ फिल्म में पूरे गांव में बिजली न होते हुए भी लाउडस्पीकर पर नमाज होती थी. इसके बाद नए दौर में कबीर खान आए जिन्होंने मक्खन और मलाई लगाते हुए हिन्दू विरोधी फिल्मों का निर्माण किया. कभी खान तिकड़ी को लेकर फिल्म हिट कराया तो कभी आतंकवादियों को पीड़ित दिखाकर. ‘काबुल एक्सप्रेस, न्यूयॉर्क, ट्यूबलाइट, फैंटम और अब 83’ हिन्दू विरोध के बड़े उदहारण हैं. आज इन सबके बारे में हम विस्तार से चर्चा करेंगे. लेकिन उससे पहले हम फिल्म मेकर ‘कबीर खान’ के बारे में बात करेंगे. जिन्होंने हिन्दुओं और भारत का नीचा दिखाने का जिम्मा उठाया है.

कबीर खान पुराने हिन्दू विरोधी दलों की अगली उपज हैं. जो हिन्दू विरोधी दृश्यों के माध्यम से हिन्दू धर्म को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं. कबीर खान केवल फिल्मों ही नहीं, वास्तविकता में भी हिन्दू विरोधी बयान देते रहते हैं. हाल ही में उन्होंने अपने एक बयान में मुगलों को भारत निर्माता बताया था. उन मुगलों को भारत का निर्माता बताया था, जिनके हाथ हिन्दुओं के नरसंहार और मंदिरों के विध्वंस से रंगे हुए हैं. फिल्मों के जरिए आतंकवादियों के साथ सहानुभूति दिखाना और मीडिया के माध्यम से इस्लामी आक्रान्ताओं का गुणगान करना कबीर खान का काम है.

2006 में आई फिल्म ‘काबुल एक्सप्रेस’ में उन्होंने पाकिस्तानी अभिनेता सलमान शाहिद को ही बतौर अभिनेता कास्ट किया था. 2015 में आई फिल्म ‘फैंटम’ का प्लाट आतंकवादियों के सफाए का रखा. लेकिन फिल्म का मुख्य किरदार एक भारतीय पुलिस अधिकारी मुस्लिम ही होता है, जिसके नाम में ‘खान’ होता है. ठीक ऐसे ही ‘ट्यूबलाइट’ फिल्म के जरिए भी चीन के प्रति सहानूभूति दिखाई गई. फिल्म में चीन की युवती को पीड़ित दिखाकर उसपर फिल्म बनाई गई है.

2015 में फिल्म आई थी ‘बजरंगी भाई जान’. फिल्म को चीन में रिलीज़ कराकर करोड़ों कमाए गए. जहां ये फिल्म काफी हिट रही थी. एक मुस्लिम (सलमान खान) को हिन्दू ब्राह्मण बनाकर दिखाया गया. मुस्लिम एक्टर यदि हिन्दू हो, और साथ में ब्राहमण हो, तो फिर मेकर्स के लिए यह सोने पे सुहागा का काम करता है. इसके बाद हिन्दुओं को कितना भी बदनाम किया जाए, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. हनुमान जी के नाम पर बनाई गई इस फिल्म में हिन्दुओं के विरोध में बहुत कुछ दिखाया गया है. फिल्म में सलमान खान ने ‘पवन कुमार चतुर्वेदी’ नाम के इंसान का किरदार निभाया है.

फिल्म में एक छोटी सी मुस्लिम लड़की है, जो पीड़ित है. सलमान खान जब उससे मिलते हैं तो उसे मांस मछली खिलाना होता है. जबकि हिन्दू ब्राहमण का रोल कर रहे सलमान खान खुद शुद्ध शाकाहारी होते हैं. लड़की को मस्जिद में भी जाना है, क्योंकि उसे नमाज भी पढ़ना है. लड़की को देह व्यापार में झोंकने वाली साड़ी पहने महिला हिन्दू होती है. जबकि सीमा पर पाकिस्तानी फ़ौज बहुत दयावान होती है. जो बजरंगी भाई जान को नेक कार्य के लिए पाकिस्तान में जाने देती है. फिल्म में एक मौलवी भी है, जो अपनी जान पर खेलकर इन दोनों की जान बचाता है. इतना इस्लामी मसाला होते हुए भी एक पत्रकार है, जो अपनी जान जोखिम में डालकर सलमान खान की मदद करता है.

अब इस कहानी की वास्तिवकता देखिए कि क्या कभी आपने किसी मौलवीयों को ऐसा करते देखा है? दरअसल, वहां के मस्जिदों में लड़कियों को सिर कलम करने की ट्रेनिंग दी जाती है. मौलवी ईशनिंदा का केस करा देते हैं. वहाँ के क्रिकेटर तक ‘गजवा-ए-हिन्द’ का समर्थन करते हुए जिहाद फैलाते हैं. किसी महिला को ‘हूर’ बना कर प्रदर्शनी लगाई जाती है. जबरन धर्मांतरण के खिलाफ कानून बनता है तो मुल्ला-मौलवी इसके विरोध में सड़क पर उतर आते हैं. मदरसे में रेप होता है. कहीं अब्बा मौलवी ही अपनी बेटियों का रेप करता है.

इतना सब रायता फ़ैलाने के बाद भी कबीर खान की फिल्म में सरे पाकिस्तानी अच्छे होते हैं. पत्रकार बहुत सीधा – सादा होता है. साथ ही वहां का मौलवी पुलिसकर्मीयों से पंगा लेकर भारतीयों की जान बचाता है. जबकि यह सच्चाई है कि सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी पत्रकार भारत के खिलाफ ज़हर उगलते नहीं थकते. इसका सीधा अर्थ है कि कबीर खान पाकिस्तान का प्रोपेगंडा आगे बढ़ा रहे हैं. इस्लामी कट्टरवादी सोच को हवा दे रहे हैं. साथ ही वो हिन्दुओं को तो नीचा दिखा ही रहे हैं.

हालिया रिलीज़ ’83’ में भी पाकिस्तानियों का बखूबी महिमामंडन किया गया है. ऑप इंडिया की खबर के अनुसार, ’83’ में दिखाया गया है कि भारतीय सेना के निवेदन पर पाकस्तानी फौजी सीमा पर गोलीबारी रोक देते हैं, ताकि भारतीय सैनिक शांति से स्कोर सुन सकें. जबकि सच्चाई ये है कि जून 2019 में जब पाकिस्तान ने विश्व कप मैच में पाकिस्तान को हराया था, तो उस दिन भी पाकिस्तानी फ़ौज ने सीजफायर का उल्लंघन किया था.

इसके अलावा ‘83’ में एक ‘अच्छा मुस्लिम’ भी है, जो बुजुर्ग है और इस्लामी टोपी पहनता है. वो भारत का मैच देखने के लिए इतना बेचैन होता है कि कर्फ्यू के दौरान भी पुलिसकर्मियों से छिप कर अपना एंटीना ठीक करता है. जीत के जश्न में आगे बढ़ कर शामिल होता है. जबकि वास्तविकता ये है कि कई मुस्लिम बहुल इलाकों में हालिया T20 विश्व कप में पाकिस्तान के हाथों भारत की हार के बाद पटाखे छोड़े गए. लिबरल जमात ने इसे ‘करवा चौथ के पटाखे’ बता कर ख़ारिज किया. कबीर खान ने ऐसी घटनाओं को छिपाने के लिए ’83’ के सहारे कहानी रची.

अब ‘अच्छा मुस्लिम’ वाले इतना ज्यादा रायता फैला चुके हैं कि आने वाले समय में बॉलीवुड का खात्मा होना तय है. अब यहां वहीँ फ़िल्में चलेंगी, जो हिन्दुओं के समर्थन में होंगी. बाकि हमारा भी दायित्व है कि इस्लामी कट्टरपंथी फिल्मों का हम पूर्णत: बायकाट करें जिससे इन्हें इनकी असली औकात पता चल सके.

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