Bachchhan Pandey vs The Kashmir Files: सिनेमा की गलियों में बच्चन पाण्डेय ने ली एंट्री, द कश्मीर फाइल्स के सामने क्यों नहीं टिक पाई फिल्म?

एक फिल्म जिसके ट्रेलर ने ही यूट्यूब पर धूम मचा दी थी वहीँ दूसरी एक फिल्म जिसने बीते कल की सच्चाई को लोगों तक पहुँचाने का काम किया. ‘द कश्मीर फाइल्स’ जिसके बारे में अंदाज़ा लगाया जा रहा था कि बाकि छोटी बजट के फिल्मों की तरह इसका हाल भी बेहाल हो जाएगा. लेकिन फिर चला सिनेमा का जादू, सौ से हज़ार, हजार से लाख और अब फिल्म की कहानी करोड़ों तक पहुंच चुकी है. सबकी अब एक आवाज़- द कश्मीर फाइल्स जिंदाबाद. लोग फिल्म की तारीफों में व्यस्त थे और फिल्म को काफी ज़बरदस्त रिव्यूज़ भी मिल रहे थे. फिर अचानक ही सिनेमा की गलियों में बच्चन पाण्डेय की एंट्री होती है. ये वो फिल्म है जिसके ट्रेलर ने यूट्यूब पर धूम मचा दी थी.

दर्शकों को जो भी चीजें फिल्म में चाहिए होती हैं वो सब बच्चन पाण्डेय में कूट-कूट कर भर दिया गया, लेकिन बच्चन पाण्डेय के मेकर्स फिल्म में वो चीज़ डालना भूल गए जिसकी वजह से सिनेमा की शुरुआत हुई थी. “इमोशंस”, जिसकी वजह से दर्शक फिल्म में ही अपनी दुनिया को ढूंढने लगते हैं. जबकि द कश्मीर फाइल्स सिर्फ और सिर्फ इमोशंस पर दौड़ लगा रही है. किसी को बुरा लगा तो कोई हैरान हो गया लेकिन एक भी इंसान ऐसा नहीं मिलेगा जिसपर फिल्म का असर न हुआ हो. किसको पता था कि द कश्मीर फाइल्स के सामने अक्षय कुमार जैसे बड़े स्टार की फिल्म को भी झुकना पड़ेगा. वो भी उस वक़्त जब बॉलीवुड में चारों तरफ बच्चन पाण्डेय का गुणगान हो रहा था.

मीडिया से लेकर सेलिब्रिटीज तक सभी बच्चन पाण्डेय फिल्म के अम्बेसडर बन के घूम रहे थे. वहीँ द कश्मीर फाइल्स के बारे में बात करने से ही बड़े-बड़े लोग कतरा रहे थे. भारत के इतिहास का वो काला पन्ना जिसको आज तक छुपा कर और दबा कर रखा गया उसके बारे में बात करने से ही उन्हें शर्म महसूस होती है. इसके बावजूद भी 21 मार्च तक द कश्मीर फाइल्स का कलेक्शन हुआ लगभग 179 करोड़ और बच्चन पाण्डेय 41 करोड़ पर सिमट गई. इसके कई कारण हो सकते हैं-

  1. फिल्म के नाम पर बच्चन पाण्डेय एकदम मजाक है, ना कोई कहानी ना ढंग की एक्टिंग और इमोशंस से तो दूर-दूर तक लेना-देना ही नहीं है फिल्म का.
  2. वही पुराना कांसेप्ट, अच्छे दिल वाला बुरा आदमी जो क्लाइमेक्स में जाकर विलेन से हीरो बन जाता है.
  3. द कश्मीर फाइल्स; जो एक फिल्म ही नहीं अब एक मूवमेंट बन चुका है. बच्चन पाण्डेय जैसी 10-15 फ़िल्में आकर चली जाएंगी लेकिन द कश्मीर फाइल्स के चर्चे तब भी लोगों के कानों में गूंजते रहेंगे. बॉलीवुड के प्रमोशन की इस फिल्म को जरूरत ही नहीं है, पब्लिक इज द किंग.
  4. अगला कारण हैं फरहाद सामजी, जिनके लिए पब्लिक बेवकूफ है, कुछ भी दिखा दो घंटा फर्क नहीं पड़ता. रिमेक पर रिमेक या फिर गाने के लिरिक्स में माता वैष्णो देवी का भजन, सब कुछ चलता है.

दूर से चमक मारने वाली हर चीज़ सोना नहीं होती, इसीलिए उस फिल्म के पीछे मत भागिए जिसमें बड़ा स्टार है या जिसका बजट 100-200 करोड़ पार है. कंटेंट, सब्जेक्ट और टैलेंट, किसी भी फिल्म को देखने से पहले हमेशा इन तीनो चीजों पर ध्यान रखना बहुत जरूरी है.