Shakti (1982) के 40 वर्ष: मदर इंडिया से प्रेरित होकर रमेश सिप्पी ने बनाई यह फिल्म, पहली बार साथ नजर आए अमिताभ और दिलीप कुमार

सलीम जावेद की जोड़ी अपने आप में माइलस्टोन कही जाती है. जिन्होंने अंदाज (1971), शोले (1975) और शान (1980) की कहानी लिख कर फिल्म को सुपरहिट कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी. 1982 में रिलीज़ मूवी ‘शक्ति’ याद है. जिसमें अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार जैसे सुपरस्टार्स ने साथ काम किया था. आज इसके 40 वर्ष पूरे होने पर हम फिल्म से जुड़ी यादें ताजा कर रहे हैं. फिल्म का डायरेक्शन रमेश सिप्पी ने किया था. इन्होने पहले ही शोले जैसी फिल्मों के हित होने पर नाम कमा लिया था. यह 80 के दशक की पहली फिल्म थी, जिसमें अभिनय जगत के महारथी समझे जाने वाले दो कलाकार- दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन पहली बार एक साथ काम कर रहे थे.

दरअसल, रमेश सिप्पी ‘मदर इंडिया’ की तरह एक फिल्म बनाना चाहते थे. जिसमे पिता को अपने आदर्शों के लिए पुत्र का बलिदान करते हुए दिखाया जाए. उन्होंने शिवजी गणेशन की एक तमिल फिल्म के राइट्स खरीदकर अपने लेखकों की टीम सलीम-जावेद के साथ मिलकर उस फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाया और ‘शक्ति’ फिल्म की स्क्रिप्ट को तैयार किया. ‘शक्ति’ फिल्म की कहानी, पटकथा और प्रस्तुतिकरण में सलीम-जावेद की पिछली फिल्म दीवार (1975) का साफ़ असर दिखाई देता है जो स्वयं ‘मदर इंडिया’ और ‘गंगा जमुना’ से प्रेरित थी.

कहानी

अश्विनी कुमार (दिलीप कुमार) एक ईमानदार पुलिस अधिकारी है. अश्विनी कुमार कुख्यात गैंगस्टर जे० के० के एक साथी यशवंत को गिरफ्तार कर लेता है. उसे छुड़ाने के लिए जे० के०  अश्विनी कुमार के बेटे विजय (अमिताभ बच्चन) को उठा लेता है और अश्विनी कुमार से अपने साथी को छोड़ने को कहता है. पर अश्विनी कुमार यह कहकर यशवंत को छोड़ने से मना कर देता है कि चाहे उसके बेटे को मार भी दिया जाए पर वो यशवंत को नहीं छोड़ेगा. मासूम विजय अपने पिता की ये बात सुन लेता है और इसका उसके दिलो-दिमाग पर गहरा असर पड़ता है. किसी तरह विजय जे० के० के चंगुल से तो भाग जाता है पर उसके मन में अपने पिता के लिए इज़्ज़त और प्यार ख़त्म हो जाता है. वक़्त के साथ-साथ विजय और उसके पिता में दूरियां बढ़ती जाती हैं.

फिल्म के एक सीन में अमिताभ और दिलीप कुमार

बड़ा होने पर विजय कुछ बेरोजगारी की वजह और कुछ अपने पिता से दूरियों के कारण अपराध की दुनिया में दाखिल हो जाता है. थोड़े ही दिनों में विजय स्वयं एक जाना- माना गैंगस्टर बन जाता है. अब गैंगस्टर विजय कानून के एक तरफ है और डी.एस.पी. अश्विनी कुमार दूसरी तरफ. मीडिया इस बात को लेकर अश्विनी कुमार की ईमानदारी पर सवाल उठाती है तो अश्विनी कुमार विजय को पकड़ने का बीड़ा उठाता है और विजय के पीछे पड़ जाता है. अंत में अश्विनी कुमार के हाथों विजय मारा जाता हैं. मरते-मरते विजय अपने पिता से अपने बुरे कामों के लिए माफ़ी मांगता है और बताता है कि बचपन की उस घटना के बावजूद वो उनको बहुत प्यार करता रहा.

फिल्म में पिता-पुत्र की कहानी साथ-साथ विजय और उसकी माँ के बीच माँ-बेटे की मार्मिक कहानी एवं विजय और उसकी प्रेमिका रोमा की प्रेम-कहानी भी चलती रहती है.

मुख्य कलाकार

दिलीप कुमार – डी सी पी अश्विनी कुमार

अमिताभ बच्चन – विजय कुमार

राखी – शीतल कुमार

स्मिता पाटिल – रोमा देवी

अमरीश पुरी – जे के वर्मा

कुलभूषण खरबंदा – के डी नारंग

दलीप ताहिल – गणपत राय

अशोक कुमार – पुलिस कमिशनर

सतीश शाह – सतीश

अनिल कपूर – रवि कुमार, विजय व रोमा का पुत्र, अतिथि पात्र

हालाँकि रिलीज़ के समय फिल्म को समीक्षकों की तारीफ़ और सराहना मिली. परन्तु बॉक्स ऑफिस पर फिल्म को साधारण सफलता ही मिली. उसी वर्ष रिलीज़ हुई अमिताभ बच्चन की अन्य फिल्मों ‘नमक हलाल’, ‘कालिया’, ‘खुद्दार’ और ‘सत्ते पे सत्ता’ और दिलीप कुमार की रिलीज़ हुई फिल्म ‘विधाता’ की तुलना में इस फिल्म को कुछ कम सफलता मिली. लेकिन अब इस फिल्म की गिनती 80 के दशक की श्रेष्ठतम फिल्मों में की जाती है.

अवार्ड्स

इस फिल्म ने वर्ष 1982 के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले, सर्वश्रेष्ठ ध्वनि-संकलन और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार हासिल किया. दिलचस्प बात ये है कि इस फिल्म के लिए दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन दोनों ही सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार के लिए नामित किये गए थे पर पुरस्कार जीतने में दिलीप कुमार कामयाब रहे.

वर्षश्रेणीकलाकारपरिणामटिप्पणी
१९८३
(1983)
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कारमुशीर आलम, मोहम्मद रियाज़जीतएम आर प्रोडक्शंस के लिए
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कारदिलीप कुमारजीत
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कारअमिताभ बच्चननामित
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कारराखीनामित
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्काररमेश सिप्पीनामित