जन्माष्टमी विशेष: जब गरीब सुदामा से मिलने नंगे पांव दौड़ पड़े थे प्रभु श्रीकृष्ण, जानिए कृष्ण-सुदामा के मित्रता की पूरी कहानी

श्रीकृष्ण के परममित्र सुदामा उनसे मिलने के लिए द्वारिका पहुंचे. वह द्वारका के आगंतुक थे. फटे-पुराने वस्त्र, सर पर पगड़ी नहीं और न पैर में खडाऊं, ऐसी स्थिति में गरीब ब्राह्मण सुदामा को देखकर द्वारिकावासीयों को विश्वास ही न हुआ जब उन्होंने ऐसा कहा कि वे श्रीकृष्ण के मित्र हैं और उनसे मिलने के लिए द्वारिका पधारे हैं.

अजनबी सीधे श्रीकृष्ण के महल की ओर चल दिया. महल के बाहर का पहरेदार सतर्क हो गया. पहरेदार के रूप में लंबा-चौड़ा, मोटी मूंछों वाला और दो सींगों वाला एक एक भयानक व्यक्ति था. अजनबी व्यक्ति(सुदामा) को महल के पास आते देख पहरेदार के होश उड़ गए. वह अपने स्वामी से मिलने के लिए आने वाले राजकुमारों और राजाओं के अभ्यस्त थे. वह गणमान्य व्यक्तियों को महल के प्रांगण तक ले जाने हेतु नियुक्त थे. इतना गरीब आदमी उसने कभी महल के पास आते नहीं देखा था. अवांछित अतिथि को रोकने के इरादे से वह आगे बढ़ा.

पहरेदार ने सुदामा को रोककर पूछा कि तुम कौन हो और महल के अन्दर कहाँ जाने की चेष्टा कर रहे हो. तब सुदामा ने कहा कि वे श्रीकृष्ण के बचपन के सखा हैं और उनसे मिलने आये हैं. सुदामा जी जैसे गरीब ब्राह्मण को देखकर वह द्वारपाल तो तनिक भी विश्वास नहीं कर पा रहा था कि ऐसे व्यक्ति भी भगवान श्री कृष्ण के मित्र हो सकते हैं लेकिन संस्कार और नम्रता बस वह उन्हें कुछ नहीं कहा और सीधा जाकर भगवान कृष्ण को यह संदेश दिया. द्वारपाल के मुख से सुदामा जी के आने की खबर सुनकर श्री कृष्ण खुशी के मारे उछल पड़े और पागलों की तरह दौड़ते दौड़ते सुदामा जी के पास तुरंत ही पहुंच गए और उन्हें देखते ही गले लगा लिया.

उन्हें देखकर मुख पर मुस्कान लिए उन्होंने पुकारा, “सुदामा, मेरे दोस्त, क्या आश्चर्य है!” श्रीकृष्ण को अतिथि को गले लगाते देख द्वारपाल ठिठक गया! इतने वर्षों बाद मिलकर दोनों मित्रों की आंखों से आंसू छलक पड़े और वे दोनों प्रसन्नता के मारे एक दूसरे से कुछ बोल भी ना पा रहे थे. आगंतुक ने खुशी के आंसू बहाते हुए श्रीकृष्ण को ‘गोविंदा’ कहकर गले लगाया. यह सुनकर कि एक अतिथि आया है, श्रीकृष्ण की पत्नी रुक्मिणी द्वार पर आई. वह मेहमान के पैर धोने के लिए पानी ले आई. श्रीकृष्ण ने अपने पहने हुए रेशमी कपड़े से उनके पैर पोंछे और उन्हें झूले पर बिठाया. दोनों दोस्त पुराने जमाने की बातें करने लगे.

श्रीकृष्ण और सुदामा गुरु संदीपनी के वन विद्यालय में सहपाठी थे. अपने मित्र की पीठ थपथपाते हुए श्रीकृष्ण ने कहा, “तो तुम विवाहित हो! भाभी ने मेरे लिए जरूर कुछ भेजा होगा. मुझे देखने दो कि तुम्हारे थैले में क्या है.” श्रीकृष्ण ने सुदामा का थैला खोला तो उसमें कुछ मुट्ठी चावल सुदामा की पत्नी ने श्रीकृष्ण के लिए भेजे थे. उस मुट्ठी भर चावल में श्रीकृष्ण ने देखा कि उसमें उनके और उनकी पत्नी के लिए उनके लिए अथाह प्रेम था. उन्होंने इसे दिव्य बना दिया.

जब श्री कृष्ण सुदामा जी से इस तरह वार्तालाप कर रहे थे तब उन्होंने झट से पोटली में से एक मुट्ठी चावल उठाया और  तुरंत मुंह में डाल लिया. इसी प्रकार उन्होंने दूसरी बार भी किया भगवान कृष्ण के ऐसा करते ही उन्होंने संपूर्ण संसार की ऐश्वर्य आदि सुदामा जी के घर में स्थापित कर दिया. भगवान कृष्ण को इस तरह चावल खाते देख सभी देवता घबरा गए यदि भगवान कृष्ण ने यह पूरा चावल खा लिया तो यह पृथ्वी तो जाएगी ही साथ में वह अपना वैकुंठ भी सुदामा को अर्पण कर देंगे. सबको इसमें से बचाने के लिए भाग्यलक्ष्मी माता रुकमणी देवी ने श्री कृष्ण का हाथ पकड़ लिया और कहा जब से सुदामा जी की शादी हुई है तब से आपकी भाभी मेरी भाभी भी हुई ना तो इस स्वादिष्ट चावल पर सिर्फ आपका हक कैसे हो सकता है यही कहते हुए उन्होंने झट से भगवान कृष्ण के हाथों से वे स्वादिष्ट चावल की पोटली छीन ली और स्वयं ही खा गई. देवी रुक्मणी के ऐसा करते ही समस्त दुर्लभ ऐश्वर्या सुदामा जी को स्वयं ही प्राप्त हो गए.

इसके बाद रुक्मिणी ने भव्य भोजन परोसा. कृष्ण ने स्वयं अपने मित्र को मिठाई परोसी. दोपहर के भोजन के बाद प्रात: काल सुदामा अपने घर की ओर वापस प्रस्थान कर गए. विचार करके सुदामा धीरे-धीरे अपने निवास स्थान पर पहुंच गए किंतु वहां पहुंच कर उन्होंने देखा कि प्रत्येक वस्तु आश्चर्यजनक रूप से बदल चुकी है और उनकी कुटिया के स्थान पर भव्य महल खड़ा है, जिसमें अनेक बहुमूल्य रत्न लगे हुए हैं यह देखकर सुदामा को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था और उन्होंने आसपास के लोगों से पूछना शुरू कि यहां पर मेरी कुटिया रहती थी यह था, वह था वह सब कहां गया.

महल के सेवकों को कुछ भी ना पता था कि यह व्यक्ति कौन है और कहां से आया है इसलिए उन्होंने इसकी खबर तुरंत ही सुदामा जी की पत्नी सुशीला को दी जो उस महल की मालकिन थी. सेवकों ने कहा महारानी जी यहां कोई एक दरिद्र ब्राह्मण आया है और कह रहा है कि यहां पर मेरी कुटिया थी यहां पर हम ऐसा करते थे, वैसा करते थे यह सब कहां गया.

यह सब सुनकर सुशीला जी अत्यंत खुश हो गई और कहा वह कोई और नहीं बल्कि तुम्हारे महाराज ही हैं और तुम सब जल्दी से उनकी आने स्वागत की तैयारियां करो, तत्पश्चात वे स्वयं अपने हाथों में आरती की थाली लेकर सुदामा जी के सामने आए. पहली बार अपनी पत्नी को गहनों से इतना लदा हुआ देखकर सुदामा जी की आंखें चौंधिया गई और वह समझ नहीं पा रहे थे कि यह कौन देवी है जो स्वयं स्वर्गीय देवियों की तरह दिख रही है सुदामा जी को देखते ही उनकी पत्नी ने उनके चरण पकड़ लिए और अपना परिचय दिया तब जाकर सुदामा जी को पता चला, यह कोई और नहीं बल्कि उनकी स्वयं की पत्नी सुशीला ही है.

इसके बाद सुशीला जी, सुदामा जी का हाथ पकड़कर महल के अंदर ले गई और उन्हें अपना निजी भवन दिखाया किंतु उस महल को देखते ही सुदामा जी एक तरफ से अपने परिवार के लिए खुश थे कि उन्हेंउन्हें अब गरीबी का सामना नहीं करना पड़ेगा लेकिन अंदर ही अंदर बहुत दुखी हो रहे थे कि यदि मैं इन सब में लिप्त हो गया तो भगवान के लिए तो समय ही नहीं निकाल पाऊंगा मैं भी आलसी, लोभी हो जाऊंगा. वे सब कुछ समझ गए कि यह किसी और का नहीं बल्कि उनके मित्र श्री कृष्ण का ही सब किया धरा है और इसीलिए उन्होंने मुझे आते समय कुछ भी नहीं दिया कि मार्ग में मुझे परेशानी ना हो, अब सुदामा जी की आंखों से आंसू बहने लगे थे और वे दुखी मन से महल के बाहर निकल आए और कहने लगे हे भगवान मैं क्या करूंगा इन सब का मुझे तो इन भौतिक वस्तुओं और ऐश्वर्या की तनिक भी चाह नहीं है, मैं तो केवल आपकी भक्ति में ही खुश रहना चाहता हूं, मैं इस बड़े महल में नहीं रहना चाहता.

सुदामा जी की इस प्रेम पूर्ण भक्ति को देखकर स्वयं श्रीकृष्ण वहां प्रगट हो गए और कहा प्रिय सुदामा तुम तो मेरे सच्चे भक्त हो. तुमने अपने जीवन में बहुत दरिद्रता, गरीबी देखी है किंतु अब मैं चाहता हूं कि तुम अब और बिल्कुल दुख ना सहो. मेरी इच्छा है कि आज से जब तक तुम्हारा जीवन शेष है, तुम इस महल में निवास करो और मेरा यह वरदान है तुम्हें कि तुम कभी यहां मोह माया से लिप्त नहीं होगे और मृत्यु उपरांत तुम्हें परमधाम प्राप्त होगा. सुदामा जी ने भगवान कृष्ण की इच्छा और आज्ञा का सम्मान किया और उन्हें प्रणाम करके वापस महल में चले गए किंतु महल की चकाचौंध ने उन्हें कभी प्रभावित नहीं किया. यही है सच्ची मित्रता जो एक दूसरे को कभी भी संकट में नहीं देख सकते.